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05:24, 7 फ़रवरी 2012 <poem>अब की शाखों पर
बसन्त तुम
फूल नहीं रोटियाँ खिलाना |
युगों -युगों से
प्यासे होठों को
अपना मकरन्द पिलाना |
धूसर मिट्टी की
महिमा पर
कालजयी कविताएँ लिखना ,
राजभवन
जाने से पहले
होरी के आंगन में दिखना ,
सूखी टहनी
पीले पत्तों पर मत
अपना रौब जमाना |
जंगल ,खेतों
और पठारों को
मोहक हरियाली देना ,
बच्चों को
अनकही कहानी
फूल ,तितलियों वाली देना ,
चिन्गारी ,लू
लपटों वाला
मौसम अपने साथ न लाना |
सुनो ! दिहाड़ी -
मजदूरन को
फूलों के गुलदस्ते देना ,
बन्द गली
फिर राह न रोके
खुली सड़क ,चौरस्ते देना ,
साँझ ढले
स्लम की देहरी पर
उम्मीदों के दिए जलाना |</poem>