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अंगिका रामायण / तेसरोॅ सर्ग / भाग 10 / विजेता मुद्‍गलपुरी

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नीलवर्ण कमल समान श्याम वर्ण वाला
जिनका कि देखि कामदेव भी लजाय छै।
सरद के चाँद जकाँ जिनकर मुख सोहै
गला के रोॅ तीन रेखा अजब बुझाय छै।
लाल रंग ओठ, मुख-नाक अति सुन्दर छै
हँसि चाँदनी जकाँ उजास भरि जाय छै।
कमल नयन, मनोहर चितवन हरि
भगत के जौने बरवस ही लुभाय छै॥91॥

टेढ़ोॅ कामदेव के धनुष जकाँ भौंह लागै
दिव्य छै ललाट आरू तिलक सोहाय छै।
कान में कुण्डल सिर मुकुट सोहायमान
घुघरैलोॅ लट सहजें लटकि जाय छै।
रतन जटित हार गला लटकलोॅ होलोू
गरदन जेना सिंह सरिस बुझाय छै।
सुन्दर जनेऊ, करधनी, तरकस वाण
अनुपम छवि बड़ी जिया ललचाय छै॥92॥

जिनकर अंश से जगत जीव उपजल
जिनकर अंश से ई माया उपजल छै।
ब्रह्मा-विष्णु आरो शिव छेका जिनकर अंश
जिनकर शक्ति से ई जगत अचल छै।
लछमी-ब्रह्माणी अेॅ शिवानी तीन महाशक्ति
जिनकर बलें सत जग में अटल छै।
भनत ‘विजेता’ तीनो लोक, तीनो काल में ई
जिनकर बल से धरम निशचल छै॥93॥

शोभा के समुद्र जकाँ हरि के स्वरूप मनु
एक बेर देखलक, देखते ही रहलै।
एक पल के भी लेल पलक न झपकल
प्रेम अश्रुधारा निरझर जकाँ बहलै।
आनन्द आधीन देह के सेॅ सुध बिसरल
शरण गहल चित चेत कहाँ रहलै!
सिर परसी क तब लेलन उठाय हरि
इहेॅ विधि प्रभु के रोॅ प्रभुता निमहलै॥97॥

दोहा -

जे सुन्दर सत् काम सन, जिनका सन नै आन।
सब उपमा से छै परे, करूणा पति भगवान॥15॥

हरि आबी कहलन वर माँगोॅ, वर माँगोॅ
कोनो वर मनु-सतरूप के न फुरलै।
परम पुरूष के स-नैन दरसन भेल
सकल मनोरथ तुरत आबी पुरलै।
फेरो मनु महाराज मन में संकोच राखि
एक वेर यातना के तरफ बहुरलै।
नाथ हम चाहैत छी तोहरे समान पुत्र
बस एक याचक के एतना ही जुरलै॥95॥

मनु के बचन सुनि करूणा निधान हरि
कहलन हमरा समान कहाँ आन छै।
जगत के भोग तजि हमरोॅ चाहत राखै
एन्हों प्राणी जगत में बड़ी भाग्यवान छै।
नृप तारेॉ पुत्र बनी अपने आयब हम
कही क बहुत खुश करूणा निधान छै।
सुनि क विनित भाव कहलकि सतरूपा
हमरो चाहत में त उहेॅ वरदान छै॥96॥

आरो एक बात तब कहलकि सतरूपा
अपनोॅ भगत सन नाथ नेह राखियै।
वहेॅ सुख, वहेॅ, गति आरो वहेॅ भगति भी
आरो ओनाही अपन शरण में राखियै।
ओनाही विवेक-बुद्धि, रहन-सहन सब
घटेॅ न ई नेह कृपा एतना टा राखियै।
सुनते ही एवमस्तु कहलन कृपा सिन्धु
कहलन धरम सहेजी चित राखियै॥97॥

पुत्र में अगाध प्रेम माँगलन मनु जेना-
मणि बिन फणि आरो जल बिन मीन छै।
हमरा त दियौ नाथ एहन अगाध प्रेम
भगत जेना कि नित भगति में लीन छै।
जेला न चकोर कभी चाँद के विलोकि थकै
जेना कि जीवोॅ के तन प्राण के अधीन छै।
एन्होॅ वर माँगी मनु हरि के चरण गहै
जेना कोनो दाता के चरण गहै दीन छै॥98॥

जब तोहें होबेॅ मनु अवध नरेश आरू
सत्रूपा अवध के रानी तब बनती।
तब तहाँ आबी हम बनब तोहरा पूत
जहाँ कि हमर माता सत्रूपा बनती।
एतना कहि क हरि अंतरधियान भेल
परब्रह्म के भी माता पलना में आनती।
माता सत्रूपा तब वर हरखिल भेलि
अपनोॅ उदर से नारायण के जनती॥99॥

दोहा -

मनु-सत्रूपा प्रेम बस, पैलन ई आशीश।
ऐता इनका गोद में, बालक बनि जगदीश॥16॥

कहै याज्ञवलक जी, सुनोॅ ऋषि भारद्वाज
ई कथा कहेश पारवती के सुनैलकै।
मनु-सतरूपा बड़ी आनन्द मगन भेल
पूत रूपें हरि के पावै के वर पैलकै।
हरि के कहल अनुसार मनु-सतरूपा
दोनो जाय अमरावती में बास कैलकै।
अवध में वहेॅ दशरथ अेॅ कौशल्या भेल
बाल लीला देखि दोनों जनम जुरैलकै॥100॥