भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

"आत्माव्लोकन / शमशाद इलाही अंसारी" के अवतरणों में अंतर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
 
पंक्ति 6: पंक्ति 6:
 
{{KKCatKavita‎}}
 
{{KKCatKavita‎}}
 
<poem>
 
<poem>
शुभकामनायें भेजते हो
+
शुभकामनाएँ भेजते हो
 
उपदेश देते हो
 
उपदेश देते हो
प्रसन्न रहने का।
+
प्रसन्न रहने का ।
  
 
सदैव कामना करते हो
 
सदैव कामना करते हो
 
दूसरों की ख़ुशियों के लिए
 
दूसरों की ख़ुशियों के लिए
किन्तु, कभी आत्माव्लोकन किया है?
+
किन्तु, कभी आत्माव्लोकन किया है ?
स्वयं अपने को अपने से मिलवाया है?
+
स्वयं अपने को अपने से मिलवाया है ?
  
 
तुम कहते हो, तुम दुख़ के सागर हो
 
तुम कहते हो, तुम दुख़ के सागर हो
पंक्ति 19: पंक्ति 19:
 
मात्र स्वप्न में ही सम्भव है
 
मात्र स्वप्न में ही सम्भव है
 
तुम अपने को अधूरा कहते हो
 
तुम अपने को अधूरा कहते हो
क्यों समझते हो अक्षम स्वयं को?
+
क्यों समझते हो अक्षम स्वयं को ?
तुम स्वयं खुश क्यों नहीं रह सकते?
+
तुम स्वयं खुश क्यों नहीं रह सकते ?
  
 
क्यों देते हो प्राथमिकता
 
क्यों देते हो प्राथमिकता
शारीरिक अपंगता को?
+
शारीरिक अपंगता को ?
  
 
मैं पूछता हूँ तुमसे
 
मैं पूछता हूँ तुमसे
क्या तुम्हारा अन्तर-मानव भी अपूर्ण है?
+
क्या तुम्हारा अन्तर-मानव भी अपूर्ण है ?
 
मैं कहता हूँ तुमसे,
 
मैं कहता हूँ तुमसे,
 
देखो अपने भीतर
 
देखो अपने भीतर
पंक्ति 32: पंक्ति 32:
 
कई मार्ग हैं इससे मिलने के
 
कई मार्ग हैं इससे मिलने के
 
पहचानों इसे
 
पहचानों इसे
इसे जीवित रखो।
+
इसे जीवित रखो ।
  
 
जो तुम होना चाहते हो
 
जो तुम होना चाहते हो
कोई असंभव कार्य नहीं।
+
कोई असंभव कार्य नहीं ।
 
यह लक्ष प्राप्य है
 
यह लक्ष प्राप्य है
 
इसके लिये मात्र
 
इसके लिये मात्र
पंक्ति 42: पंक्ति 42:
 
सोचो भला, स्वयं निराश व्यक्ति
 
सोचो भला, स्वयं निराश व्यक्ति
 
बुझे दीपक भाँति
 
बुझे दीपक भाँति
कैसे प्रकाश दे सकता है?
+
कैसे प्रकाश दे सकता है ?
 
कैसे दे सकता है वरदान
 
कैसे दे सकता है वरदान
आश्वासन, शुभ-कामनायें
+
आश्वासन, शुभ-कामनाएँ
 
दूसरों को सलाह
 
दूसरों को सलाह
 
सुखी रहने की?
 
सुखी रहने की?

22:57, 2 जून 2011 के समय का अवतरण

शुभकामनाएँ भेजते हो
उपदेश देते हो
प्रसन्न रहने का ।

सदैव कामना करते हो
दूसरों की ख़ुशियों के लिए
किन्तु, कभी आत्माव्लोकन किया है ?
स्वयं अपने को अपने से मिलवाया है ?

तुम कहते हो, तुम दुख़ के सागर हो
सुख मिलन तुम्हारे समक्ष
मात्र स्वप्न में ही सम्भव है
तुम अपने को अधूरा कहते हो
क्यों समझते हो अक्षम स्वयं को ?
तुम स्वयं खुश क्यों नहीं रह सकते ?

क्यों देते हो प्राथमिकता
शारीरिक अपंगता को ?

मैं पूछता हूँ तुमसे
क्या तुम्हारा अन्तर-मानव भी अपूर्ण है ?
मैं कहता हूँ तुमसे,
देखो अपने भीतर
वहाँ एक सम्पूर्ण आत्मा है
कई मार्ग हैं इससे मिलने के
पहचानों इसे
इसे जीवित रखो ।

जो तुम होना चाहते हो
कोई असंभव कार्य नहीं ।
यह लक्ष प्राप्य है
इसके लिये मात्र
दृढ निश्चय ही आवश्यक है

सोचो भला, स्वयं निराश व्यक्ति
बुझे दीपक भाँति
कैसे प्रकाश दे सकता है ?
कैसे दे सकता है वरदान
आश्वासन, शुभ-कामनाएँ
दूसरों को सलाह
सुखी रहने की?


रचनाकाल : 13.02.1988