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"इश्क़ तासीर से नौमेद नहीं / ग़ालिब" के अवतरणों में अंतर

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हम को जीने की भी उम्मीद नहीं <br><br>
 
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05:23, 26 दिसम्बर 2006 का अवतरण

लेखक: ग़ालिब

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इश्क़ तासीर से नौमेद नहीं
जाँ सुपारी शजर-ए-बेद नहीं

सुल्तनत दस्त-ब-दस्त आई है
जाम-ए-मै ख़ातम-ए-जमशेद नहीं

है तजल्ली तेरी सामने वजूद
जरा बेपरतवे ख़ुर्शीद नहीं

राज़-ए-माशूक़ न रुसवा हो जाये
वर्ना मर जाने में कुछ भेद नहीं

गर्दिश-ए-रंग-ए-तरब से डर है
ग़म-ए-महरूमी-ए-जावेद नहीं

कहते हैं जीते हैं उम्मीद पे लोग
हम को जीने की भी उम्मीद नहीं