भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

ऊँचि डांड्यू तुम नीसि जावा / गढ़वाली

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

   ♦   रचनाकार: महिमानंद

ऊँचि डांड्यू तुम नीसी जावा

घणी कुलायो तुम छाँटि होवा

मैकू लगी छ खुद मैतुड़ा की

बाबाजी को देखण देस देवा

मैत की मेरी तु त पौण प्यारी

सुणौ तु रैवार त मा को मेरी

गडू गदन्य व हिलाँस कप्फू

मैत को मेर तुम गीत गावा


भावार्थ


--'हे ऊँची पहाड़ियो! तुम नीची हो जाओ ।

ओ चीड़ के घने वृक्षो! तुम समने से छँट जाओ ।

मुझे मायके की याद सता रही है,

मुझे पिता जी का देस देखने दो ।

ओ मेरे मायके की हवा !

मेरी माँ का सन्देश सुना ।

ओ नदी-नालो! ओ हिलाँस पक्षी! ओ कप्फू!

तुम सब मिल कर मेरे मायके का गीत गाओ ।'