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कविताएं और मै / निमिषा सिंघल

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कविताओं ने छुपा लिया है
जब से मुझे अपने आंचल में
सारा अवसाद जाता रहा
जैसे आसमान तले चिल्लाकर
निकाल दी जाती है भड़ास
गुम हो जाती है आवाज़ हवा के साथ

जैसे ओढ़ लिया हो
स्वयं ही
कविताओं ने
मेरे भीतर का कोलाहल।

जैसे समुद्र छिपा लेता है सारे शोर
नदियों, जीव-जंतुओं के
कविताएँ भी मेरे लिए समुंद्र से कम न थी!
मैं भी कविता होना चाहती हूँ।