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कवि का कोट / अशोक कुमार पाण्डेय / मार्टिन एस्पादा

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जेफ मेल (1946.2003) के लिए

जब मैं खाँसता हूँ
लोगा ठोड़ी के नीचे तक बहते खून की कल्पना कर
कोयला खनिकों वाले रोग से डरकर हट जाते है

इमरजेंसी वाले कमरे में डाक्टर एक्स रे की ओर देखता है
जहाँ फेफड़े फेंक दी गयी कविता की तरह तुड़े-मुड़े हो रहे होते हैं
तुमने मुझे खाँसते हुए सुना तो अपना कोट उतारा
और इज्जत से मेरे कन्धों पर डाल दिया
तो मैं हवा और बारिश का शहंशाह हो गया
तुमने कहा रख लो इसे तुम मेरे गुरू हो

मैने रख लिया इसे,
जासूसी फिल्मों वाला ढीला-ढाला कोट जिसकी अपने की अकड़ है
वियतनाम का युद्ध तुम्हारे मस्तिष्क में जलती नौकाओं की सर्पिल नदी-सा
उमड़-घमड़ रहा था
लेकिन फिर भी तुम्हारे हाथ
मछलियों की तरह चमकती कविताओं से भरे थे

वर्जीनिया के राजमार्ग
इतनी सारी किताबों वाले तुम अश्वेत को
सपनों मे फाँसी पर लटकाने के लिए
अपनी संघीय सेना के गुप्त दस्ते भेज रहे थे
लेकिन फिर भी तुमने अपने कोट को लपेट दिया मेरे इर्द-गिर्द

बोस्टन में तुम्हारे अन्तिम संस्कार वाली रात
फ्लोरिडा के समुद्र तट पर मैंने पहना तुम्हारा कोट

हवा चिपक गयी मेरे चेहरे पर बालू के साथ
और हर थपेड़े के साथ मैंने याद की तुम्हारी राख
बारिश के तीरों की हर बौछार में तुम्हारा कोट एक योद्धा का कवच बन गया
मेरे लिए

समुद्र तट पर मुझे मिला समुद्री मछली का कंकाल
विजेता नमक चाट गया था उसके काँटेे और चीता जैसी खाल
तुम्हारे कोट ने उस विजेता को वापस फेंक दिया समुद्र में
जल्द ही तुम्हारी राख आर्लिग्टन की कब्रगाह में ले जाई जाएगी जहाज़ से
जहाँ कभी संघ सेना के जनरल ने तुम्हें अपने सुअरों और खच्चरों में से एक
समझा होता
कवि का कोट आखिरी कविता है तुम्हारी
मैं इस कोट जैसी एक कविता लिखना चाहता हूँ
हरे कपड़े बटन और जेबों वाली
एक कविता जो खॉंसते हुए आदमी के काम आ सके
सिखाआ मुझे