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गीत 10 / सतरहवां अध्याय / अंगिका गीत गीता / विजेता मुद्‍गलपुरी

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ओम-तत्-सत्, ओम-तत् सत् तीन पावन नाम छै
सृष्टि में आरम्भ से, व्यापित सगर, हर ठाम छै।

जे रचलका आदि में ही
वेद-ब्राह्मण-यग के,
ओम-तत्-सत् नाम छिक
परब्रह्म के, सर्वज्ञ के,
यग-तप अरु दान, जग में तीन पावन काम छै
ओम-तत्-सत्, ओम-तत् सत् तीन पावन नाम छै।

वेद मंत्रों में प्रथम जे
उच्चरित छै, ‘ओम’ छिक,
यग में, तप-दान में
सब टा क्रिया में ओम छिक,
सर्वदा कल्याण कारक और सुख के धाम छै
ओम-तत्-सत्, ओम-तत् सत् तीन पावन नाम छै।

और ‘तत्’ के अर्थ छै
परमात्मा ही सब छिकै,
यग-तप अरु दान के
बस निमित्त प्राणी सब छिकै,
कर्म खुद होतें रहै, कर्ता जहाँ निष्काम छै
ओम-तत्-सत्, ओम-तत् सत् तीन पावन नाम छै।

‘सत्’ छिकै सत्-नाम जे
सब दिन बसै सत्-भाव में,
‘सत्’ बसै छै सत् पुरुष के
श्रेष्ठतम स्वभाव में,
तत्त्व अविनाशी छिकै ‘सत्’, ब्रह्म के सत् नाम छै
ओम-तत्-सत्, ओम-तत् सत् तीन पावन नाम छै।