भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

चश्म-ए-हसीं में है न रुख़-ए-फ़ित्ना-गर में है / बेहज़ाद लखनवी

Kavita Kosh से
अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 04:25, 18 अप्रैल 2018 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=बेहज़ाद लखनवी }} {{KKCatGhazal}} <poem> चश्म-ए-हस...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

चश्म-ए-हसीं में है न रुख़-ए-फ़ित्ना-गर में है
दुनिया का हर फ़रेब फ़रेब-ए-नज़र में है

अब क्या ख़बर कि दिल में है क्या-क्या जिगर में है
अब तो तिरी नज़र का तमाशा नज़र में है

ईमान रख के क्या करूँ फ़र्सूदा चीज़ है
मस्ती मुझे क़ुबूल कि तेरी नज़र में है

नासूर दर्द-ए-ज़ख़्म तपिश सोज़-ओ-इज़्तिराब
सामान सौ तरह का दिल-ए-मुख़्तसर में है

हाज़िर है उस के वास्ते जिस को हो आरज़ू
हाँ, इक लहू की बूँद मिरी चश्म-ए-तर में है

क़िस्मत से मिल गई है ये बेदारी-ए-हयात
इस इश्क़ के निसार कि दुनिया नज़र में है

मुझ को न दिन को चैन न शब को सुकूँ नसीब
इक रब्त-ए-दाइमी मिरी शाम-ओ-सहर में है

हैरत से देखिए न मिरे सज्दा-हा-ए-शौक़
ये आस्ताँ कुछ और ही मेरी नज़र में है

बाक़ी हैं बा'द-ए-तौबा भी रिंदी के वलवले
दिल में ख़याल-ए-बादा है साग़र नज़र में है

अच्छी मिली है मुझ को ये दीवानगी-ए-शौक़
दुनिया का हर ख़याल दिल-ए-बे-ख़बर में है

दो क़तरा-हा-ए-ख़ूँ सर-ए-मिज़्गाँ हैं मुंतज़िर
'बहज़ाद' दो-जहाँ का तमाशा नज़र में है