भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

"चाँदनी करती चली परिहास / गुलाब खंडेलवाल" के अवतरणों में अंतर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
 
पंक्ति 19: पंक्ति 19:
 
लाज से तीनों गये मर जब कि आयी पास
 
लाज से तीनों गये मर जब कि आयी पास
  
एक चकवी के खुले पट
+
एक चकई के खुले पट
 
एक नभ-दीपक बुझा झट
 
एक नभ-दीपक बुझा झट
एक बाला सरित तट पर आ गयी, कटि पर लिए घट
+
एक बाला सरित-तट पर आ गयी, कटि पर लिये घट
एक विरहिन सो गयी होकर नितांत हतास
+
एक विरहिन सो गयी होकर नितांत हताश
  
 
चाँदनी करती चली परिहास
 
चाँदनी करती चली परिहास

01:34, 20 जुलाई 2011 के समय का अवतरण


चाँदनी करती चली परिहास

एक मधुकर को जगाया
एक पक्षी सो न पाया
एक नत शेफालि का आँसू धरा पर ढुलक आया
रात में कुछ प्रात का ऐसा हुआ आभास

एक कमल विकच खड़ा था
एक कुमुद मुँदा पड़ा था
एक झोंका वायु का, गति के लिए नभ में अड़ा था
लाज से तीनों गये मर जब कि आयी पास

एक चकई के खुले पट
एक नभ-दीपक बुझा झट
एक बाला सरित-तट पर आ गयी, कटि पर लिये घट
एक विरहिन सो गयी होकर नितांत हताश

चाँदनी करती चली परिहास