भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

चोंच का लोहा काठ का मन / मृदुला सिंह

Kavita Kosh से
सशुल्क योगदानकर्ता ५ (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 22:20, 11 सितम्बर 2021 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=मृदुला सिंह |अनुवादक= |संग्रह=पोख...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

लगातार गुम हो रही है
उजाड़ के अंधकार में
कठफोड़वे की आवाज
इसके चोंच का लोहा
काटता है काठ का हृदय
बुनता है टक-टक की ध्वनि
जिसमें गूंजती है
जीवन की उम्मीद

श्रम से बनाये अपने ठौर को
गर्भिणी सुग्गी को सौंप
उड़ जाते हैं दूर
और जुट जाते हैं
फिर से नए की जुगत में
बनाते जाते हैं मेहनत से
घोसले में टिकते नहीं
सौंपते जाते हैं दूसरे को

मेरे इस कंक्रीटी शहर में
जरूरत है तुम्हारी
यहाँ एकांत है बाहर
लेकिन अंदर शोर बहुत है
अजनबीयत की छांव पसरी है
हर किसी के चेहरे पर

बुलाती हूँ तुम्हे ओ मित्र
आओ यहाँ बचा है अभी भी
बूढ़ा एक शीशम
खाली पड़ी जमीन पर
बैठो और सिखाओ
हमारे शहरी बच्चों को
दुनिर्वारण के गुर
तय करनी है उन्हें अभी
आगे की कठिन यात्रा
तुम्हारा दिया पाथेय बनेगा
उनकी धुंधली पगडंडियों में

संभावनाओं की रोशनी छिटकेगी
मिल जुल कर बांटेंगे ये अपना-अपना
दुखम-सुखम