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छठॅ सर्ग / उर्ध्वरेता / सुमन सूरो

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जहाँ सुनहला मेरु-शिखर पर
शुभ अशोक के छाँह घना,
हरखिन दुनियाँ के कोलाहल
केॅ प्रवेश सें करै मना,

दूध-चान्दनी के फेनॅ रं
झलमल गंगा के धारा,
बिना जिरैने चक्रकुण्ड में
झरै किरण के फब्बारा

बादल जहाँ जाम्बुनद सोना,
के छटका सें उठै ललाय,
हर परबॅ पर यज्ञ-भाग लेॅ
जुटै देब-रिसि के समुदाय

हर मौसम के दिव्य-फूल-फल
सँचलॅ जग के पुण्य समान,
गोल मंडलाकार शिखर जे,
सब समृद्धि सब सुख के खान।

वही शिखर पर कुटज कुटी में;
जात-कर्म के शुभ संस्कार;
पूर्ण करलकै जह्नु सुता ने
शिशु के लोक-वेद आचार।

छट्ठी देवी खुदे उतरलै,
रिसि-मंडल के साथॅ में,
मंगल गायन स्वस्तिपाठ;
लै दुर्बा-अच्छत हाथॅ में।

गंधमादनॅ लें उतरी केॅ
पवन-प्रिया अंजना सुमाय
‘महावली’ के आशिष देलकै
गोदीं लै केॅ हाथ बुलाय।

दू बरसॅ तक रहलै गंगा,
खुद लेॅ केॅ रक्षा के भार;
अलग खोह में कहीं सिंहनी;
जेना साथें सिंह-कुमार।

हेमकूट, मैनाक, हिरण्यक,
होलॅ विन्दु सरोवर में,
शिशु के साथ उतरलै गंगा,
धरती-स्वर्ग धरोहर में।

जे ठाँ पैहलॅ दर्शन देने,
छेलै व्रतो भगीरथ केॅ,
सात धार अर्पलक हुलसी;
केॅ भारत के तीरथ केॅ।

जे ठाँ मनुख मात्र के जीवन,
लेॅ माँग रिसि-मुनि कल्याण;
धरती के सुख-शान्ति-प्रेम लेॅ
जे ठाँ गहन सूत्र संधान।

बालू के ढीहॅ पर वै ठाँ;
सुन्दर बालक केॅ बैठाय;
ब्रह्मा-विष्णु महेश वरलकै
कर जोड़ी केॅ शीश नवाय।

सुत के सुभ पवित्र जीवन के;
मन्ता मानलकै चुपचाप;
चारो दीश लपेटी गल्ला
में माताँ साड़ी के नाँछ।

मुट्ठी में सोना के बालू,
लेॅ केॅ दोनों हाथ उठाय;
छोड़ै कनी-कनी आगू में
बुतरूँ मगनमने मुस्काय।

उदयाचल सें सुरजें छोड़ै,
छै मानॅ किरणॅ के रास;
रस्सें-रस्सें कलीं परोसै,
मन्द हवा केॅ गन्ध-सुवास।

दूर-दूर तक छिति पर निर्मल,
जल के मोहक लहर विलास
समगति हवा प्रेम लौलीनॅ;
रूप-मुग्ध झुकलॅ आकाश।

पर्वत शिखर-वक्ष सें मानें,
नील वसन सँसरी लहराय;
धरती बेसुरता में खाढ़ी
मुग्धा रं हरखै अगराय।

डूबे हलका नील मेघ में,
जेठ पूर्णमासी के चान;
डुबको देलकै जह्नुनु-सुता ने;
जल में, जल केॅ करी प्रणाम।

आगिन सें तपलॅ सोना केॅ,
जेना पानीं बोरि उठाय,
तहिने तेजवन्त बालक केॅ
माताँ आनलकै नहवाय।

हुलसी-मटकी लाबरॅ लेल्कै,
साड़ी-नाँछ पसारो केॅ,
सुमरी सुरुजदेव के महिमा;
देवता-पितर गुहारो केॅ।

चैत्य नगीचें एक कुटी में,
धँसलै जोती-छटा समान;
पूर्णाहुति पर हवन-कुण्ड में;
यज्ञ-अग्नि पावै विश्राम

2.

नील-आकाशॅमें मुस्कैलै तिरोदशी के गोरॅ
परसरो गेलै स्वच्छ चाँदनी, हॅसलै जल-पवत-सुनसान,
बिन्दु सरोवर के छाती पर उगलॅ जोति-कमल के रेख
चकमक डोलै मन्द हवा में, चढ़ै लहर-पर लहर अलेख।

बालू के डीहॅ पर बैठी केॅ गदगद बालक बाचाल,
रूप निहारै जिज्ञासा सें तरह-तरह के करै सवाल।
मायँ मिटाबै जिज्ञासा तेॅ फेरू जिज्ञासा तैयार,
मानॅ पूर्ण चन्द्रमा देखी सागर में ज्वारॅ-पर-ज्वार।

या पैहलॅ कवि के अन्तर में जागी उठलै भाव अनेक,
प्रकृति नटी के रूप छटा में निरजासी लीला अनलेख
तरुणी होलै रात मिलै नै बातॅ लें बातॅ के ओर;
मोड़लकै माताँ बालक केॅ पकड़ी एक कथा के छोर

छत्री बीरॅ रं ओजस्वी तेजस्वी दिनमान समान,
एक पुरुष छै यै धरती पर शस्त्र-शास्त्र दोनों के खान,
भृगुकुल भूषण-मणि अपराजित परशुराम जगदग्नि कुमार;
जिनकॅ शासन के सीमा सें दूर पराबै अत्याचार।

सूत्रधार नवका संस्कृति के; जुग-जुग के आदर्श महान,
पितृभक्त, गुरुभक्त, तपस्वी, सदाचार, सद्गुण के मान;
शालग्राम पर्वत पर गेलै गुरु के पास जनौ के बाद;
बालपन्हैं में सीखलकै सब विद्या; जानलकै अपवाद।

माय रेणुका के कोखी के राखलकै दूधॅ के लाज,
शिव-आज्ञा सें ध्वस्त करलकै हेमकूट के असुर समाज,
शिब ने धनुर्वेद के शिक्षा, देलकै दिव्य अस्त्र के दान
परशु सहित कोदण्ड त्रयम्बक मृत्युंजय विद्या के ज्ञान

दक्खिन में सहसार्जुन होलै महाबली राजा कुख्यात,
जेकरॅ आतंकॅ सॅ काँपै धरती गाछ-बिरिछ खड़ पात,
लूटी लै आश्रम बलजबड़ी करै अहिंसक पर अन्याय,
बिना कारनें झगड़ै सबसं खुट्टॅ खोजो करै लड़ाय।

रावण के सेना केॅ देलकै वें ने कत्तेॅ बेरी मात,
कत्तेॅ बेर करलकै निष्फल, पराक्रमी के घात बलात।
मनबढ़ुवॅ होलै अन्यायी, अत्याचारॅ में लौलीन;
ओकरा लागूँ बनलै उद्भट बीरॅ के जेरॅ बलहीन।

एकबेर जमदग्नि मुनी के कामधेनु प्राणोपम गाय
आश्रम सें छोनी लै गेलै, होलै मुनि के बिफल उपाय।
मालूम होलै परशुराम केॅ छोपी देलकै माथॅ जाय,
पूज्य पिता केॅ आनी देलक कामधेनु फरू लौटाय।

टन्टा बढ़लै, चोरी सें सेना ने लेलकै मुनि के जान,
बेर एकैस धुनलकै माताँ कानी केॅ छाती अबिराम।
जत्तेॅ बेरी मायँ धुनलकै छाता ओत्त बेरी नाश;
करला पर अन्यायी कुल के, परशुराम ने लेलके साँस

उत्तर हिमगिरी में दक्खिन सागर तक अत्याचार विहीन
धरा करलकै संकल्पो ने, कण-कण हँसलै जीवन दीन
जितलॅ राज-पाट देॅ देलक अश्वमेघ में गुरु केॅ दान
भौतिक सुख केॅ निपट बुझी केॅ मानॅ पूजा-अर्ब समान।

दान-भूमि छोड़ी पहुँची गेलै सहयाद्रि गिरि के खण्ड,
लेने मुट्ठी में सॅकल्पित परशु सहित भीषण कोदण्ड।
बाध्य करी देलकै समुद्र केॅ छोड़ लेॅ खेती के भूम;
सहयाद्री पर्वत पर मचलै परशुराम-पौरुष के धूम

यै धरती पर नै छै एक्को हुनकॅ जोड़ो वीर महान,
हुनियें सौपलकै समाज केॅ सद्गुण सदाचार अभिमान।“
-बोली केॅ चुप होलै गंगा, डनकी उठलै बाल मराल;
”हुनकॅ जोड़ो बनना छै हमरा पर माता! करॅ खियाल।

तुरत बताबॅ सह्याद्री पर्वत छै कॅ ठॉ; कत्तेॅ दूर?
तुरत बताबॅ माता! हमरॅ मॅन करॅ नै चकनाचूर।
दर्शन करबै गुरुदेवॅ के, जल्दी बनबै वीर समान;
हम्हूँ रखबै माय बराबर दूधँ के, कोखी के मान।“

छाती में कस्सी केॅ गंगाँ बालक के माथॅ सहलया;
”ठीक कहै छॅ ननू तौहें, तोहूँ करिहॅ वहेॅ उपाय।
वेद पढ़लकै पैहने फेरू परशुराम ने लेलकै शस्त्र
सद विवेक होला पर शोभै बीरॅ के हाथॅ में अस्त्र।

मुनि वशिष्ट सें वेद पढ़ी लेॅ, परशुराम सें वाण-कमान;
अपराजित, अक्षत, अवध्य तों जीतॅ जीवन के संग्राम।
लेकिन याद सदाये राखॅ सद विचार के पसरेॅ राज;
सहज-सहज जिनगी के रस्ताँ डेग बढ़ावेॅ सहज समाज।

नीति बड़ॅ छै मानवता सें, स्वारथ छोटॅ त्याग सें;
आनॅ पर बलिदान बड़ॅ छै हर भौतिक सुखभाग सें।
एक बेर निर्णय लेला पर, बदलेॅ नै संकल्प महान;
देवव्रत! हौ पुरुष पूज्य जें जीतै अनगिनती व्यबधान।

अग्निदेव छै पूज्य-बरै छै उपरेॅ मूहें हुनकॅ रेत;
सब अन्हार पीयै धरती के पसरै सगरी शिखा समेत।
खुदै जरै छै तभिय दै छै दुनिया केॅ प्रकाश के दान;
बदलेॅ चिनगारी में तॅे संसारॅ लेली काल समान।

उर्ध्वगमन, संघर्ष, रोशनी, गति, उपकार आत्म विस्तार;
घोर पराक्रम, दृढ़ संकल्प यहेॅ छेकै जिनगी के सार।
होम करै जें खुद अपना केॅ पाबै वें उद्देश्य महान;
यही बासतें अग्निदेव छै भार्गव के कुलदेव समान।“

रात जुबैलै बन-पर्वत पर
पसरी गेलॅ गाढ़ॅ नीन।
माता के गोदी में चंचल;
बालक सपना में लौलीन।