भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

डर / मनीष मूंदड़ा

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

वो रातों को डर कर उठना
घबराना
और फिर टूटे सपनो की बागडोर थामे
फिर से सोने की कोशिश करना
आँखे मूँदे जबरन
फिर करवट बदलना
इस आस में के नींद मिलेगी दूसरे छोर
कुछ सुकून मिलेगा दिल को उस ओर
पर वक़्त के मारों को
ख़्वाब भी कहाँ पूरे मिलते हैं?
रात तो क्या
हम दिन भी डर के साये में गुजारते हैं।