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तप्तगृह / सर्ग 1 / केदारनाथ मिश्र 'प्रभात'

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शारदे! तुम्हारी ही
इच्छा से प्रेरित हो
कहता है कवि पुकार
जय हो मनुष्य की
मानव की जय हो
जयहो उस धरती की
जिसकी सुखदायिनी
गोद में दिवस-रात
पलता मनुष्य है,
जिसका सहाय पा
चलता मनुष्य है,
दुर्दिन के मेघों की
निर्मम-हिलोर में,
चलता मनुष्य है
जिसका सनेह पा
लपटों पर अग्नि की,

जिसका सनेह पा
जलता मनुष्य है
जलता है जिस भाँति
मानवता-मंगल का
पुण्य-दीप चीरकर
नाश की कठोरतम
घड़ियों का अन्धकार!
‘कांव तो तुम्हारे ही
चरणों की ज्योति का
अंश एक छोटा-सा

वह तो तुम्हारे ही
मंदिर के द्वार पर
लीन साधना में हो
अलख जगाता है,
वह तो तुम्हारे ही
स्वर को दुहराता है।

‘जय हो मनुष्य की
मानव की जय हो
इच्छा तुम्हारी यह
निश्चय ही शारदे!
प्रथम-प्रथम तुमने ही
मानव का कंठ खोल
विश्व को पुकारा था;
प्रथम-प्रथम तुमने ही
मानव की साँसों के
तारों को बजाया था।
निकली झंकार जो
शून्य की सुवास-भरी
प्रेम-पुलक- प्यास-भरी
पहली पुकार-सी
उस पर थे नाच उठे
नभ के असंख्य प्राण,
नाच उठे उस पर थे
श्यामल सजल मेघ,
अनिल-चरण चंचल-से
सघन नील पर्वत के
रोम-रोम पुलकित से
सागर के ज्वार और
भाटा के क्रम अनन्त
नाच उठे उस पर थे
कोटि-कोटि नेत्रों को
खोल-खोल विस्मय से!

‘शारदे! तुम्हारी यही
इच्छा है, ज्ञात मुझे,
मानव वरेण्य हो,
मानव नमस्य हो,
टूटे न मानव की
मानवी-परम्परा।
उर-उर में बहती हो
प्रेम की अनन्त धार,
दृग-दृग में वर्तिका
जलती हो स्नेह की,
कंठ-कंठ आर्द्र हो
करुणा की कूक से,
श्वास-श्वास पुलकित हो
पावन पराग-भरे
उर्म्मिल अनुराग से
जीवन ही त्याग की
तप की, तपस्या की
तान ताल-ताल पर
जिसकी हो मंत्र-मुग्ध
उतरे देवत्व साथ
लेकर प्रकाश-पुंज
मानव को प्यार से
शारदे! सँवारने।’

किन्तु लिखीं मानव ने
अपने ही ढंग से
अपनी कहानियाँ
साक्षी इतिहास है
जिसके अनन्त पृष्ठ
मानव के रक्त से
लाल-लाल आज भी
जिसके अनन्त पृष्ठ

आज भी कराहते
बन्द अक्षरों में कर
आर्त्तनाद युग का
साक्षी इतिहास है
मानव ने प्यार किया
सत्ता को, बल को,
और मनुष्यत्व को
चरणों से रौंद कर
डाल यिा जलने को
भट्ठी में नाश की
साक्षी इतिहास है
मानव ने गर्व से
स्थान दिया उच्चतम
जीवन में स्वार्थ को
और डाल मस्तक पर
रत्नमुकुट उसके
आरती उतारी झूम-झूम
कर पुजारी-सा

रक्त-भरी जीत यही
मानव के स्वार्थ की
उस दिन थी खोल रही
आँखेां को, व्यंग्य ले
होठों पर लाल-लाल
जाग उठा गौरव-मद
गर्वित गिरिव्रज जब
मोहक पुकार पर
लाल लाल किरनों की।
देवदत्त सोया कब
निद्रा न पास आई
एक पल उसके
उसका मस्तिष्क था
जागता मसान-सा

और वह विचारों के
विस्फुलिंग भीषण ले
रचता विधान था
गिरिव्रज के ध्वंस का
गिरिव्रज की गरिमा में
कीर्ति में कलंक का
चिह्न लग जायेगा
मस्तक झुक जायेगा
गर्वयुत मगध का
इसकी न चिंता थी
चिंता थी एकमात्र
नीच स्वार्थ-सिद्धि की

गौतम का तेज वह
ज्योति वह गरीयसी
द्युति वह वरीयसी
हृदय देवदत्त का
प्रतिपल थी सालती
गौतम आत्मीय थे
बन्धु थे, सखा थे और
निस्पृह, निरीह थे
मंगल संसार का
परित्राण मानव का
त्राण मानवता का
गौतम के जीवन का
एकमात्र व्रत था
त्याग, सत्य, सेवा का
और संघवाद की
चतुरंग सत्ता का
तेज बढ़ा वेग से
गौतम के प्रेममय
पावन नेतृत्व में
चरणों में अवनत थे

एक क्या, अनेक नृप
एक क्या, महानशक्ति-
शाली जनपद अनेक।
स्वागत में जन-मन का
स्नेह नहीं रुकता था
स्वागत में मागध-
सम्राट बिम्बिसार ने
अर्पण साम्राज्य किया
आदर से, प्रेम से,
श्रद्धा से, भक्ति से
उर-उर में एक ही
तरंग थी, उमंग थी
इच्छा थी एक ही
एक ही लगन और
संकल्प एक ही-
”चलो शरण बुद्ध की
चलो शरण धर्म की
चलो शरण संघ की।“

भक्तिपूर्ण शब्द ये
स्वप्न में भी गूँजकर
द्वेषी देवदत्त को
विचलित कर देते थे,
और वह बार-बार
क्रोध से चबाता था
होठों को अपने।
बार-बार उठता था
खौल रक्त उसका
जलती थी ईंधन-सी
साँसें, शरीर और
मन की समस्त शांति।
सौ-सौ शलाकों से
अग्नि को कुरेद कर
हिंसा उकसाती थी
लपटों को वेग से।

देवदत्त बोल उठा-
”धर्म-चक्र गौतम का
आगे ही बढ़ता है
जनपदीय शासन भी
आ चुका प्रभाव में।
आचार्य मैं भी हूँ,
हिंसा ही रोकेगी
गति अब अहिंसा की।
मेरे संकेत से
चलेगा धर्म-चक्र अब
मेरी ही इच्छा अब
होगी संचालिका
शक्ति सब धर्म की,
चाहे चुकाना पड़े
जो भी मूल्य इसका!“

बिम्बिसार मागध-
सम्राट नींद-मग्न थे;
किंतु राजधानी की
आत्मा न सोई थी।
उसने पुकार सुन
द्वेष को कठोरतम
स्वर में संकल्प के
नीच देवदत्त के
गहरी-सी साँस ली
और फिर पूर्ववत्
शांत वह हो गई।