भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

"तस्कीं को हम न रोयें जो ज़ौक़-ए-नज़र मिले / ग़ालिब" के अवतरणों में अंतर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
पंक्ति 12: पंक्ति 12:
  
 
साक़ी गरी की शर्म करो आज वर्ना हम <br>
 
साक़ी गरी की शर्म करो आज वर्ना हम <br>
हर शब पिया ही करते हैं मै जिस क़दर मिले <br><br>
+
हर शब पिया ही करते हैं मय जिस क़दर मिले <br><br>
  
तुझ से तो कुछ कलाम नहीन लेकिन अए नदीम <br>
+
तुझ से तो कुछ कलाम नहीं लेकिन नदीम <br>
मेरा सलाम कहीयो अगर नामाबर मिले <br><br>
+
मेरा सलाम कहियो अगर नामाबर मिले <br><br>
  
तुम को भी हम दिखाये के मजनूँ ने क्या किया <br>
+
तुम को भी हम दिखायें के मजनूँ ने क्या किया <br>
 
फ़ुर्सत कशाकश-ए-ग़म-ए-पिन्हाँ से गर मिले <br><br>
 
फ़ुर्सत कशाकश-ए-ग़म-ए-पिन्हाँ से गर मिले <br><br>
  
पंक्ति 23: पंक्ति 23:
 
माना के एक बुज़ुर्ग हमें हम सफ़र मिले <br><br>
 
माना के एक बुज़ुर्ग हमें हम सफ़र मिले <br><br>
  
अए साकनान-ए-कुचा-ए-दिलदार देखना <br>
+
साकनान-ए-कुचा-ए-दिलदार देखना <br>
तुम को कहीं जो ग़लिब-ए-आशुफ़्ता सर मिले <br><br>
+
तुम को कहीं जो ग़ालिब-ए-आशुफ़्ता सर मिले <br><br>

00:56, 22 मई 2009 का अवतरण

तस्कीं को हम न रोएँ जो ज़ौक़-ए-नज़र मिले
हूराँ-ए-ख़ुल्द में तेरी सूरत मगर मिले

अपनी गली में मुझ को न कर दफ़्न बाद-ए-क़त्ल
मेरे पते से ख़ल्क़ को क्यों तेरा घर मिले

साक़ी गरी की शर्म करो आज वर्ना हम
हर शब पिया ही करते हैं मय जिस क़दर मिले

तुझ से तो कुछ कलाम नहीं लेकिन ऐ नदीम
मेरा सलाम कहियो अगर नामाबर मिले

तुम को भी हम दिखायें के मजनूँ ने क्या किया
फ़ुर्सत कशाकश-ए-ग़म-ए-पिन्हाँ से गर मिले

लाज़िम नहीं के ख़िज्र की हम पैरवी करें
माना के एक बुज़ुर्ग हमें हम सफ़र मिले

ऐ साकनान-ए-कुचा-ए-दिलदार देखना
तुम को कहीं जो ग़ालिब-ए-आशुफ़्ता सर मिले