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तालो / मुकेश तिलोकाणी

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अखियुनि
हुन जे
घर जो
पूरो पतो वरितो
रस्ते तां
दुकानदार खां
चीजूं ख़रीद कयूं
बस जा
धिका झोॿा खाईंदो
मन मं आशा उमंग खणंदो
वधंदो आयो,
ज़हिन में सुवाल?
अॼु...!?
हा...अॼु।
सभु बराबर - हा बराबर
हीअ गली
हू घरु
सॻियो ॿाहिरां थल्हो
अड़े तालो!