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तेईस / प्रबोधिनी / परमेश्वरी सिंह 'अनपढ़'

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कुत्ते को सिर पर बैठा लिया तो
आखिर सिर खुजलाना क्या

काँटे चुभते उसको, जो उसको बोता है
विषधर डँसता उसको, जिसका वह होता है
विषधर को अपना लेने की तुमने कैसे हिम्मत कर ली
विश के हित! सच! अपने मन से तुमने इतनी मिहनत कर ली

जो पाल चुका है नाग
मौत से उसका है डर जाना क्या

कितनी लापरबाही से तुम विषधर को गले लगाया था
तोड़े बिन उसका गरल दंत, सच उसको मीत बनाया था
गलती करके तुम सोच रहे, मैं दंडित कभी न होऊँगा
शूल पर तन को चढ़ा कह रहे, खंडित कभी न होऊँगा

नादान समझ जिसकी ऐसी
फिर उसको है समझाना क्या

जो बात बिगड़ती है एक दी, सौ दिन न बनाए बनती है
बेहतर है बिगड़े बात नहीं! बस! बात-बात में बनती है
बातों को छोटा मत समझो, बातें ही जीवन का मोल
बातों पर ही टिका हुआ, देखो सारे भूगोल-खगोल

जो अंधा-धुंध चला करते,
उनको ठोकर लग जाना क्या