भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

"दर्द से मेरे है तुझ को बेक़रारी हाय हाय / ग़ालिब" के अवतरणों में अंतर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
पंक्ति 8: पंक्ति 8:
 
क्या हुई ज़ालिम तिरी ग़फलत-शि`आरी हाए हाए<br><br>
 
क्या हुई ज़ालिम तिरी ग़फलत-शि`आरी हाए हाए<br><br>
  
तेरे दिल में गर न था आशोब-ए ग़म का हौसला<br>
+
तेरे दिल में गर न था आशोब-ए-ग़म का हौसला<br>
 
तू ने फिर क्यूं की थी मेरी ग़म-गुसारी हाए हाए<br><br>
 
तू ने फिर क्यूं की थी मेरी ग़म-गुसारी हाए हाए<br><br>
  
पंक्ति 14: पंक्ति 14:
 
दुश्मनी अपनी थी मेरी दोस्त-दारी हाए हाए<br><br>
 
दुश्मनी अपनी थी मेरी दोस्त-दारी हाए हाए<br><br>
  
उम्र भर का तू ने पैमान-ए वफ़ा बांधा तो क्या<br>
+
उम्र भर का तू ने पैमान-ए-वफ़ा बांधा तो क्या<br>
 
उम्र को भी तो नहीं है पाइदारी हाए हाए<br><br>
 
उम्र को भी तो नहीं है पाइदारी हाए हाए<br><br>
  
ज़हर लगती है मुझे आब-ओ-हवा-ए ज़िन्दगी<br>
+
ज़हर लगती है मुझे आब-ओ-हवा-ए-ज़िन्दगी<br>
 
यानी तुझ से थी उसे ना-साज़गारी हाए हाए<br><br>
 
यानी तुझ से थी उसे ना-साज़गारी हाए हाए<br><br>
  
गुल-फ़िशानीहा-ए नाज़-ए जलवा को क्या हो गया<br>
+
गुल-फ़िशानीहा-ए-नाज़-ए-जलवा को क्या हो गया<br>
 
ख़ाक पर होती है तेरी लालह-कारी हाए हाए<br><br>
 
ख़ाक पर होती है तेरी लालह-कारी हाए हाए<br><br>
  
शर्म-ए रुसवाई से जा छुपना नक़ाब-ए ख़ाक में<br>
+
शर्म-ए-रुसवाई से जा छुपना नक़ाब-ए-ख़ाक में<br>
 
ख़तम है उल्फ़त की तुझ पर पर्दह-दारी हाए हाए<br><br>
 
ख़तम है उल्फ़त की तुझ पर पर्दह-दारी हाए हाए<br><br>
  
ख़ाक में नामूस-ए पैमान-ए मुहब्बत मिल गई<br>
+
ख़ाक में नामूस-ए-पैमाना-ए-मुहब्बत मिल गई<br>
उठ गई दुनिया से राह-ओ-रस्म-ए यारी हाए हाए<br><br>
+
उठ गई दुनिया से राह-ओ-रस्म-ए-यारी हाए हाए<br><br>
  
 
हाथ ही तेग़-आज़्मा का काम से जाता रहा<br>
 
हाथ ही तेग़-आज़्मा का काम से जाता रहा<br>
दिल पह इक लगने न पाया ज़ख़्म-ए कारी हाए हाए<br><br>
+
दिल पह इक लगने न पाया ज़ख़्म-ए-कारी हाए हाए<br><br>
  
किस तरह काटे कोई शबहा-ए तार-ए बर्श-काल<br>
+
किस तरह काटे कोई शबहा-ए-तार-ए-बर्श-काल<br>
है नज़र ख़ू-कर्दह-ए अख़्तर-शुमारी हाए हाए<br><br>
+
है नज़र ख़ू-कर्दह-ए-अख़्तर-शुमारी हाए हाए<br><br>
  
गोश महजूर-ए पयाम-ओ-चश्म महरूम-ए जमाल<br>
+
गोश महजूर-ए-पयाम-ओ-चश्म महरूम-ए-जमाल<br>
 
एक दिल तिस पर यह ना-उम्मीदवारी हाए हाए<br><br>
 
एक दिल तिस पर यह ना-उम्मीदवारी हाए हाए<br><br>
  
 
इश्क़ ने पकड़ा न था ग़ालिब अभी वहशत का रंग <br>
 
इश्क़ ने पकड़ा न था ग़ालिब अभी वहशत का रंग <br>
रह गया था दिल में जो कुछ ज़ौक़-ए ख़्वारी हाए हाए
+
रह गया था दिल में जो कुछ ज़ौक़-ए-ख़्वारी हाए हाए

01:05, 22 मई 2009 का अवतरण

दर्द से मेरे है तुझ को बे-क़रारी हाए हाए
क्या हुई ज़ालिम तिरी ग़फलत-शि`आरी हाए हाए

तेरे दिल में गर न था आशोब-ए-ग़म का हौसला
तू ने फिर क्यूं की थी मेरी ग़म-गुसारी हाए हाए

क्यूं मिरी ग़म-ख़्वारगी का तुझ को आया था ख़याल
दुश्मनी अपनी थी मेरी दोस्त-दारी हाए हाए

उम्र भर का तू ने पैमान-ए-वफ़ा बांधा तो क्या
उम्र को भी तो नहीं है पाइदारी हाए हाए

ज़हर लगती है मुझे आब-ओ-हवा-ए-ज़िन्दगी
यानी तुझ से थी उसे ना-साज़गारी हाए हाए

गुल-फ़िशानीहा-ए-नाज़-ए-जलवा को क्या हो गया
ख़ाक पर होती है तेरी लालह-कारी हाए हाए

शर्म-ए-रुसवाई से जा छुपना नक़ाब-ए-ख़ाक में
ख़तम है उल्फ़त की तुझ पर पर्दह-दारी हाए हाए

ख़ाक में नामूस-ए-पैमाना-ए-मुहब्बत मिल गई
उठ गई दुनिया से राह-ओ-रस्म-ए-यारी हाए हाए

हाथ ही तेग़-आज़्मा का काम से जाता रहा
दिल पह इक लगने न पाया ज़ख़्म-ए-कारी हाए हाए

किस तरह काटे कोई शबहा-ए-तार-ए-बर्श-काल
है नज़र ख़ू-कर्दह-ए-अख़्तर-शुमारी हाए हाए

गोश महजूर-ए-पयाम-ओ-चश्म महरूम-ए-जमाल
एक दिल तिस पर यह ना-उम्मीदवारी हाए हाए

इश्क़ ने पकड़ा न था ग़ालिब अभी वहशत का रंग
रह गया था दिल में जो कुछ ज़ौक़-ए-ख़्वारी हाए हाए