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"दै छै ठिठुराय हो / ब्रह्मदेव कुमार" के अवतरणों में अंतर

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धनी: चलोॅ जैबै पिया हो, गोड्डा बजरिया।
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एŸोॅ लागै छै कैह्ने जाड़ हमरोॅ भाय हो।
हमरा कीन दिहोॅ, हे जी कीन दिहोॅ
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बरफोॅ रोॅ ऐलोॅ रहै, बाढ़ जेना भाय हो॥
घुंघुर लागल पैंजनियाँ कीन दिहोॅ॥
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पिया: चलोॅ जैबै धनी हे, गोड्डा बजरिया।
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सर-सर बहै हवा दै छै ठिठुराय हो
तोरा कीन देभौं, हाँ जी कीन देभौं
+
कनकन्नों ठंडा सेॅ, देह ढलकाय हो।
घुंघुर लागल पैंजनियाँ कीन देभौं॥
+
लागै जेना देहोॅ में, सुईया भोकाय हो॥
  
धनी: चलबै स्कूल होय छै शिक्षक-समागम
+
जाड़ोॅ सेॅ सौसे देह, भेलै जेना सील हो
दौड़-धूप उछल-कूद, होय छै धमाधम।
+
जाड़ें जेना ठोकै, करेजा मेॅ कील हो।
चलोॅ हम्हूँ दौड़बै हो, जीतबै इनमियाँ
+
ठारोॅ रोॅ मारोॅ सेॅ, मोंन छटपटाय हो॥
हमरा कीन दिहोॅ, हे जी कीन दिहोॅ
+
मोती जड़ल चुनरिया कीन दिहोॅ॥
+
  
पिया: शिक्षक-समागम के देखोॅ महŸाा
+
सूरजोॅ रोॅ असरा में, पुरबें हियाय हो
प्रतिभा उभारै के काम अलबŸाा।
+
घन्नों, कुहासोॅ में, कुछ नै सुझाय हो।
हम्हूँ उछलबै हे, छूबै उचईया
+
गायठोॅ आरोॅ लरूवा सेॅ घुर जराय हो॥
तोरा कीन देभौं, हाँ जी कीन देभौं
+
मोती जड़ल चुनरिया कीन देभौं॥
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धनी-: कैरम, शतरंज आरोॅ होय छै चित्रांकन
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दिनें-दिन सुरुज, दूर चल्लोॅ जाय हो
फूटबौल, क्रिकेट आरोॅ खेल बैडमिंटन।
+
सुरुज जŸोॅ दूर, केते धरती ठंढाय हो।
चलोॅ हम्हूँ खेलबै हो, दैकेॅ धियनमाँ
+
सुरुजोॅ केॅ कैह्नें, देलेॅ छै रूसाय हो।
हमरा कीन दिहोॅ, हे जी कीन दिहोॅ
+
तारा टाँकल सड़िया, कीन दिहोॅ॥
+
पिया: शिक्षक-समागम के उद्देश्य महान् छै
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शिक्षकै पेॅ बच्चा के, टिकलोॅ जहान छै।
+
संस्कार सुधरतै हे, सँवरतै जिनिगिया।
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तोरा कीन देभौं, हाँ जी कीन देभौं
+
तारा टाँकल सड़िया कीन देभौं॥
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धनी: भाषण आरो वाद-विवाद भी होतै
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भीतरी घरोॅ मेॅ नरुवा बिछाय हो
एकल-युगल-समूह के गान भी होतै।
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केबाड़-खिड़की बोंन तैय्यो सब्भे सरगदाय हो।
चलोॅ हम्हूँ गैबै हे, गान मधुरिया
+
सब्भे बेकार भेलै, कम्बल-रेजाय हो॥
हमरा कीन दिहोॅ, हे जी कीन दिहोॅ
+
हमरा रेशम के चोलिया कीन दिहोॅ
+
हमरा चाँदी बटनियाँ कीन दिहोॅ॥
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पिया: शिक्षा में गुणात्मक सुधार छै करना
+
युक्ती-अहिबातिन कोय नै खिलखिलाय हो
शिक्षा सेॅ सर्वांगीन विकास छै करना।
+
रस्ता ताकी-ताकी आँख छलछलराय हो।
राष्ट्र-निर्माण में हे, समर्पित समईया
+
मटरी माय के ऐलोॅ छै कैह्ने जमाय हो॥
तोरा कीन देभौं, हाँ जी कीन देभौं
+
तोरा रेशम के चोलिया कीन देभौं
+
तोरा चाँदी बटनियाँ कीन देभौं॥
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धनी: कŸो सुन्दर लागतै हे, हमरोॅ भारत देश।
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हमरा कीन दिहोॅ, हे जी कीन दिहोॅ
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चूड़ी, सिन्दुर, टिकुलिया कीन दिहोॅ॥
+
 
+
पिया: बड़ी उपर जैतै हे, हमरोॅ ई भारत देश।
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तोरा कीन देभौं, हाँ जी कीन देभौं
+
चूड़ी-सिन्दुर-टिकुलिया कीन देभौं॥
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16:49, 3 मई 2019 के समय का अवतरण

एŸोॅ लागै छै कैह्ने जाड़ हमरोॅ भाय हो।
बरफोॅ रोॅ ऐलोॅ रहै, बाढ़ जेना भाय हो॥

सर-सर बहै हवा दै छै ठिठुराय हो
कनकन्नों ठंडा सेॅ, देह ढलकाय हो।
लागै जेना देहोॅ में, सुईया भोकाय हो॥

जाड़ोॅ सेॅ सौसे देह, भेलै जेना सील हो
जाड़ें जेना ठोकै, करेजा मेॅ कील हो।
ठारोॅ रोॅ मारोॅ सेॅ, मोंन छटपटाय हो॥

सूरजोॅ रोॅ असरा में, पुरबें हियाय हो
घन्नों, कुहासोॅ में, कुछ नै सुझाय हो।
गायठोॅ आरोॅ लरूवा सेॅ घुर जराय हो॥

दिनें-दिन सुरुज, दूर चल्लोॅ जाय हो
सुरुज जŸोॅ दूर, केते धरती ठंढाय हो।
सुरुजोॅ केॅ कैह्नें, देलेॅ छै रूसाय हो।

भीतरी घरोॅ मेॅ नरुवा बिछाय हो
केबाड़-खिड़की बोंन तैय्यो सब्भे सरगदाय हो।
सब्भे बेकार भेलै, कम्बल-रेजाय हो॥

युक्ती-अहिबातिन कोय नै खिलखिलाय हो
रस्ता ताकी-ताकी आँख छलछलराय हो।
मटरी माय के ऐलोॅ छै कैह्ने जमाय हो॥