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दोहा / भाग 3 / विक्रमादित्य सिंह विक्रम

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तनक नजर फेरै कहूँ, मिलत सु हेरे नाहिं।
सरद-मयंक मुखी दुरी, सरद जुन्हाई माहिं।।21।।

देखहु बलि चलि औचकनि, नवल बधू सुकुमार।
भौंह कसति हुलसति हँसति, रीझ भरी रिझवार।।22।।

जहँ जहँ सहज सुभाव ही, चलत अजिर सुखदानि।
तहँ तहँ लाली पगन की, चुई परत सी जानि।।23।।

मोर मुकुट कटि पीत पट, उर बनमाल रसाल।
आवत गावत सखिन मग, लखे आज नन्दलाल।।24।।

रूप-सिन्धु मुख रावरो, लसै अनूप अपार।
पैरवार दृग ललन के, पैर न पावत पार।।25।।

हार निहार उतार धर, बिधि तन रचे सिंगार।
धरनि चलत लचकत, तरुन, बारभार सुकुमार।।26।।

चौज चबाइन के रचत, हँसत सबै ब्रज लोग।
तैही कहि सखि साँवरो, है नहिं देखन जोग।।27।।

मोहि सिखावत तू कहा, मैं हू जानत बात।
उर उरझयौ चितचोर सौं, सो फिर सुरझयो जात।।28।।

बिन बातन रचती खरी, बृथा सखी परिहास।
मिलतौ जो मनभावतौ, तौ नीको परिहास।।29।।

सखी साँवरो रूप वह, देखत दृग न अघात।
लोच भरे लालच लगे, नित उतही चल जात।।30।।