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दो नारियाँ / रवीन्द्रनाथ ठाकुर

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कौन था वह क्षण
जब सृजन के समुद्र मंथन से,
पटल का शय्यातल छोड़कर,
दो नारियाँ ऊपर आई ?
एक थी उर्वशी,सौंदर्यमयी,
विश्व के कामना राज्य की रानी,
स्वर्ग-लोक की अप्सरा .
और दूसरी थी लक्ष्मी,कल्याणमयी,
विश्व की जननी के रूप में परिचित,
स्वर्ग की ईश्वरी .

एक नारी तपस्या भंग कर,
प्रखर हास्य के अग्नि-रस से
फागुन का सुरा-पात्र भरकर
प्राण-मन को हर ले जाती है.
और उन्हें
वसन्त के पुष्पित प्रलाप में,
लाल रंग के किंशुक और गुलाब में,
निद्राहीन यौवन के गान में
दोनों हाथो से बिखेर देती है .

और दूसरी
हमें आँसुओं की ओस में नहलाकर
स्नेह-सिक्त वासना में फिर लती है,
हेमन्त के स्वर्ण-कांतिमय श्स्यों से भरी
शांति की पूर्णता में लौटा लती है.
लौटा लाती है
संपूर्ण सृष्टि के वरदान की ओर,
धीर-गम्भीर,सस्मित लावण्य की
मधुर्यमयी सुधा की ओर.
धीरे से लौटा लती है
जीवन के पवित्र संगम तीर्थ पर
जहाँ
अनन्त की पूजा का मंदिर है.

३ फरवरी १९१५