भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

नैणां भरल्यूं रंग / जितेन्द्र सोनी

Kavita Kosh से
आशिष पुरोहित (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 17:13, 22 जुलाई 2011 का अवतरण (नया पृष्ठ: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=जितेन्द्र सोनी |संग्रह= }} [[Category:मूल राजस्थानी भाष…)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


पौ फाट्यां
देखूं
पोलो ग्राउंड सूं
सूरज उग्यां तक लगोलग
भाखरां माथै बादळां रा रंग
भांत-भंतीला।
बदळै है छिण-छिण ऐ रंग
आपरो रूप,
जिकां में
म्हारी ओळख रै रंगां सूं अळगा
कीं नूंवां रंग,
ज्यां रो नीं जाणूं म्हैं नांव।
पण चावूं-
चुण-चुण भर लेवूं ऐ सगळा
नैणां मांय
अर जाय'र छिड़क द्यूं
म्हारै थार री माटी मांय,
अकाळ सूं जूझता घरां माथै,
किणी गरीब रै चूल्है रै असवाड़ै-पसवाड़ै
ओळूं मांय उदास दिलां री भींतां पर।
भर सक्यो जे ऐ रंग
तो नेहचो राखो
चटकै ही
बावड़ूंलो म्हैं आं रंगां साथै
पाछो आपणी माटी मांय।