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पीढ़ी दर पीढ़ी / कर्मानंद आर्य

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हम ख़त्म हो जायेंगे
हमारी लड़ाइयाँ ख़त्म होती जाएँगी
हम प्रकृति के खिलाफ लड़ेंगे
अन्याय का तंतु तोड़
ईश्वर से बार बार होगी हमारी जंग

हम जीतने के लिए लड़ेगे
बलवान है प्रकृति
ईश्वर ने अपने हाथ मजबूत कर लिए हैं
हम अनुभव के लिए लड़ेंगे
हम लड़ेंगे
लड़ना खुद को मजबूत करना है

जैसे बादल चीखता है
फैले हुए आकाश के भीतर
जैसे रात भन्नाती है
वैसे ही एक रोज हम समवेत भन्नायेंगे
सुनेगे धरती के सारे जीव

इस तरह ख़त्म होंगे हम
और अपनी पीढ़ियोंको बताएँगे
तुम भी इसी तरह ख़त्म होना
मेरे बहादुर बच्चे
निरंतर युद्ध लड़ते हुए

जो बुद्ध ने लड़ा
जो कबीर ने लड़ा
जो सेना नाइ लड़ता रहा जीवन भर
जो कोलंबस के पैरों में चुभ गया
जिसे इक्कीसवीं सदी के दशरथ मांझी
लड़ा जीवन समझ

तुम भी लड़ना
जीवन सदियों तक चलता है
हमारी लड़ाइयाँ कभी खत्म नहीं होती