भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

पूरी आज़ादी / गुलाब सिंह

Kavita Kosh से
Dkspoet (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 17:33, 7 जनवरी 2014 का अवतरण ("पूरी आज़ादी / गुलाब सिंह" सुरक्षित कर दिया (‎[edit=sysop] (बेमियादी) ‎[move=sysop] (बेमियादी)))

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

बढ़ई बेच रहा बन्दूकें
दर्ज़ी सिलता खादी
रेंग रही पक्की सड़कों पर
गाँवों की आबादी।

खुले नर्सरी कान्वेन्ट
दुहराते ए बी सी डी
राम खेलावन के घर खेलें
बेबी डेज़ी स्वीटी,

चित्रहार के लिए ढूँढ़ते
चश्मे दादा-दादी।

बौनी फसलों से लम्बे
पनिकट नलकूपों के,
बरस-दर-बरस उड़ उड़ जाते
दाने सूपों से,

युकलिप्टस के तले फलेगी
कब केले की काँदी?

फटी बिवाई घिसने को
गलियों में लगे खड़ंजे,
झोपड़ियों के चूल्हों से
बाज़ार लड़ाते पंजे,

आँख मूँदने सो जाने की
है पूरी आज़ादी।