भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

फ़रेब-ए-राह से ग़ाफ़िल नहीं है / महेश चंद्र 'नक्श'

Kavita Kosh से
सशुल्क योगदानकर्ता २ (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 07:46, 30 जून 2013 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=पीरज़ादा क़ासीम |संग्रह= }} {{KKCatGhazal‎}}...' के साथ नया पन्ना बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

फ़रेब-ए-राह से ग़ाफ़िल नहीं है
जुनूँ गम-कर्दा-ए-मंज़िल नहीं है

मेरी ना-कामियों पर हँसने वाले
तेरे पहलू में शायद दिल नहीं है

ख़ुदा को ना-ख़ुदा कहने लगा हूँ
सफ़ीना तालिब-ए-साहिल नहीं है

तेरी बज़्म-ए-तबर में आ गया हूँ
मगर दिल को सुकूँ हासिल नहीं है

अरे उस की निगाह-ए-बे-ख़बर भी
मेरे अंजाम से ग़ाफ़िल नहीं है

मेरे ज़ौक-ए-सफ़र का पूछना क्या
निगाहों में मेरी मंज़िल नहीं है

ब-फै़ज़-ए-इश्क़ करब-ए-मर्ग से ‘नक्श’
गुजर जाना कोई मुश्किल नहीं है