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बिहारी सतसई / भाग 2 / बिहारी

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नाचि अचानक हीं उठे बिनु पावस बन मोर।
जानति हौं, नन्दित करी यहि दिसि नंद-किसोर॥11॥

पावस = वर्षा ऋतु। नंदित = आनन्दित।

बिना वर्षा-ऋतु के अचानक ही वन में मोर नाच उठे! जान पड़ता है, इस दिशा को नंद के लाड़ले (घनश्याम) ने आनन्दित किया है।

नोट-श्रीकृष्ण का सघन-मेघ-सदृश श्यामल शरीर देखकर भ्रमवश एकाएक मोर नाच उठे थे।


प्रलय करन बरषन लगे जुरि जलधर इक साथ।
सुरपति गरबु हर्यो हरषि गिरिधर गिरि धर हाथ॥12॥

प्रलय करना = संसार को जलमग्न करने के लिए। जुरि = मिलाकर। जलधर = मेघ। सुरपति = इन्द्र। गरबु (गर्व) = घमंड। गिरिधर = कृष्ण। गिरि = पहाड़। धर = धारण कर

सब मेघ एक साथ मिलकर प्रलय करने के लिए बरसने लगे। गोवर्द्धनधारी श्रीकृष्ण ने प्रसन्न होकर - इसके लिए मन में कुछ भी दुःख न मानकर - (गोवर्द्धन) पर्वत हाथ में धारण कर - उठाकर - इन्द्र का घमंड चूर किया।


डिगत पानि डिगुलात गिरि लखि सब ब्रज बेहाल।
कंप किसोरो दरसिकै खरैं लजाने लाल॥13॥

पानि = हाथ। डिगुलात = डगमगाना। बेहाल = विह्वल, बेचैन। कंप = थरथराहट। किसोरी = नवेली, राधिका। खरै = विशेष रूप से। लाल = कृष्ण।

हाथ हिलता और पर्वत डगमगाता है - यह देखकर ब्रजवासी व्याकुल हो गये। राधिका के दर्शन करके (मेरे शरीर के) कम्प के कारण ऐसा हुआ है - पर्वत हिला है (यह समझकर) कृष्णजी खूब ही लजित हुए।

नोट-इसी प्रसंग पर किसी कवि ने गजब का मजमून बाँधा है। देखिए, कवित्त-

मौंहनि कमान तानि फिरति अकेली ‘बधू’ टापै ए बिसिख कोर कज्जल भरै है री। तोहिं देखि मेरेहू गोविंद मन डोलि उठै मधवा निगोड़ो उतै रोप पकरै है री॥
बलि बिलि जाहुँ बृषभानु की कुमारी मेरो नैकु कह्यौ मान तेरो कहा बिगरै है री।
चंचल चपल ललचौहैं दृग मूँदि राखु जौलौं गिरिधारी गिरि नख पै धरै है री॥


लोपे कोपे इन्द्र लौं रोपे प्रलय अकाल।
गिरिधारी राखै सबै गो गोपी गोपाल॥14॥

लौं = तक। अकाल = असमय।

अपनी पूजा के लुप्त होने से क्रुद्ध हुए इन्द्र तक ने असमय में ही प्रलय करना चाहा। (किन्तु) गिरिधारी श्रीकृष्ण ने (गोवर्द्धन धारण कर) गो, गोपी और गोपाल-सबकी रक्षा की।

नोट - ‘इन्द्र लौं’ का अभिप्राय यह कि इसके पहले अघासुर, बकासुर आदि के उपद्रव भी हो चुके थे।


लाज गहौ बेकाज कत घेरि रहे घर जाँहि।
गोरसु चाहत फिरत हौ गोरसु चाहत नाँहि॥15॥

बेकाज = व्यर्थ, बेकार, अकारण। कत = क्यों। गोरस = गो+रस = इन्द्रियों का रस, चुम्नालिंगन आदि। गोरस = दही-दूध आदि।

कुछ लाज भी रक्खो-यों बेशर्म मत बनो। मैं घर जा रही हूँ व्यर्थ मुझे क्यों घेर रहे हो? (अब मैंने समझा कि) तुम इन्द्रियों का रस चाहते हो, दही-दूध नहीं।


मकराकृति गोपाल कैं सोहत कुंडल कान।
धरथौ मनौ हिय-गढ़ समरु ड्यौढ़ी लसत निसान॥16॥

मकराकृति = मकर+ आकृति = मछली के आकार का। धरîौ = अधिकार कर लिया। समरु = स्मर = कामदेव। ड्यौढ़ी = फाटक, द्वार। निसान = झंडा।

श्रीकृष्ण के कानों में मछली के आकार के कुंडल सोह रहे हैं। मानो कामदेव ने हृदय-रूपी गढ़ पर अधिकार कर लिया है और गढ़ के द्वार पर उनकी ध्वजा फहरा रही है।

नोट - कामदेव के झंडे पर मछली या गोह का चिह्न माना गया है। इसीसे उन्हें मीनकेतु, झखकेतु, मकरध्वज आदि कहते हैं।


गोधन तूँ हरष्यो हियैं घरियक लेहि पुजाइ।
समुझि परैगी सीस पर परत पसुनु के पाइ॥17॥

गोधन = गोबर की बनी हुई गोवर्द्धन की प्रतिमा, जिसे कार्तिक शुल्का प्रतिपदा को गृहस्थ अपने द्वार पर पूजते हैं और पूजा के बाद पशुओं से रौंदवाते हैं। घरियक = घरी+एक = एक घड़ी।

अरे गोधन! तू हृदय में हर्षित होकर एक घड़ीभर अपनी पूजा करा ले। सिर पर पशुओं के पाँव पड़ने ही (इस पूजा की यथार्थता) समझ पड़ेगी!


मिलि परछाँहीं जोन्ह सौं रहे दुहुनु के गात।
हरि-राधा इक संग हीं चले गली महिं जात॥18॥

परछाँही = छाया। जोन्ह = चाँदनी। दुहुन = दोनों। गात = शरीर।

दोनों के शरीर (एक का गोरा और दूसरे का साँवला) परछाई और चाँदनी में मिल रहे हैं। यों, श्रीकृष्ण और राधा एक ही साथ (निःशंक भाव से) गली में चले जाते हैं।

नोट - राधा का गौर शरीर उज्ज्वल चाँदनी में और श्रीकृष्ण का श्यामल शरीर राधा की छाया में मिल जाता था। यों उन दोनों को गली में जाते कोई देख नहीं सकता था। फलतः चाँदनी रात में भी वे निःशंक चले जाते थे।


गोपिनु सँग निसि सरद को रमत रसिकु रसरास।
लहालेछ अति गतिनु की सबनि लखे सब पास॥19॥

रमत = रम रहे हैं, आनन्द कर रहे हैं। रसरास = रस-रासलीला। लहाछेह = एक प्रकार का नाच जिसमें बड़ी तेजी से चक्रवत् घूमना पड़ता है; घूमते-घूमते मालूम होता है कि चारों ओर की चीजें पास नाचने लगीं।

शरद ऋतु की रात में, गोपियों के साथ, रसिक श्रीकृष्ण रसीले रास में रम रहे हैं। अत्यन्त चंचल गति के ‘लहाछेह’ नामक नृत्य के कारण सबने श्रीकृष्ण को सबके पास देखा।


मोर-चन्द्रिका स्याम-सिर चढ़ि कत करति गुमानु।
लखिबी पायन पै लुठति सुनियतु राधा-मानु॥20॥

मोर-चन्द्रिका = मुकुट में लगे मोर के पंखों की आँखें-कलँगी। गुमान = घमंड। कत = क्यों, कितना। लखिबी = देखूँगी। लुठत = लोटते हुए। मान = रोष, रूठना।

अरी मोर-चन्द्रिका! कृष्ण के सिर पर चढ़कर क्यों इतरा रही है? सुना है, राधा मान करके बैठी हैं। (अतएवं शीघ्र ही) तुझे उनके पाँवों पर लौटते हुए देखूँगी।

नोट - मानिनी राधा को श्रीकृष्ण जब मनाने जायेंगे, तब उनके पैरों पर माथा टेककर मनायँगे। उस समय मोर-चंद्रिका को राधा के पाँव पर लोटना ही होगा। मान-भंजन का भव्य वर्णन है।