भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

भरोसा / अंजू शर्मा

Kavita Kosh से
Sharda suman (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 15:17, 4 जुलाई 2014 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=अंजू शर्मा |अनुवादक= |संग्रह=कल्प...' के साथ नया पन्ना बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

शब्द यदि भौतिक होते
तो यह कहना मुश्किल न होता
कि भरोसा शब्दकोश का
सर्वाधिक क्षतिग्रस्त शब्द है,
हालांकि
जरूरी है भरोसे का सबसे अधिक प्रयोग
किये जाने वाले शब्द
में बदला जाना

भरोसा और धोखा दोनों
अक्सर पूरक शब्दों-सा बर्ताव करते
प्रतीत होते हैं
भरोसा जितना अधिक हो
उतना ही बड़ा होता है
धोखे का अनुपात

हालांकि भरोसे के आजू बाजू से अक्सर
निकल ही आता है शक
और तौलता है तर्क के तराज़ू पर
भरोसे को
इंसानियत को
दोस्तों को
और ईश्वर को
भरोसे की उंगली थाम कर
ठोकर खाने के बाद भी
शब्दकोशों में भरोसे का बने रहना सृष्टि में
पवित्रता के निहित रहने का प्रमाण है,

एक वसंत के भरोसे पर ही वृक्ष सौंप देते हैं
सभी पुराने पत्ते हर साल पतझड़ को
ताले के भरोसे गृहस्थ सौंप देता है
पूरा घर और हो जाता है निश्चिंत
एक पुरुष के भरोसे पर स्त्री रौंप
देती है अपने गर्भ में भ्रूण
माँ के भरोसे पर
शिशु रख देता है डगमगाते हुये
पहला कदम
ये भरोसा ही तो है कि
भटक जाने पर भी स्याह बियाबाँ में
कदम थमने नहीं देती
एक अदद रोशनी की आस

भरोसे में मेरी आस्था का ही स्वर है
मेरी मासूम सी कामना कि
मेरे प्रेमियों से कहीं ज्यादा
संख्या मुझ पर भरोसा कायम रखने वालों की हो
भरोसे का कायम रहना
दरअसल
इंसान का कायम रहना है,
टूटने से भरोसा, टूट जाता है एक इंसान...