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भाषा को देना होगा मेरा साथ / सुजाता

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बेगैरत भाषा से
आजकल मुझे चिढ हो गई है
मेरे शब्दों के खाँचे वह
तुम्हारे दिए अर्थों से भर देती है बार-बार
नामुराद!
देखो,
जब जब तुमने कहा-आज़ादी
क्रांतिकारी हो गए,
द्रष्टा, चेतन, विचारक!
मैंने धीमे स्वर में
धृष्टता से बुदबुदाया-
स्वतंत्रता!
और भाषा चौकन्नी हो गई
इतिहास चाक चौबंद।

जन्मी भी नहीं थी जब भाषा
तब भी
मैं थी
फिर भी इतिहास मेरी कहानी
नहीं कह पाता आरम्भ से।
किसी की तो गलती है यह!
भाषा या इतिहास की?

मैं यही सोचती थी
कि जो भाषा में बचा रह जाएगा ठीक ठाक
उसके इतिहास में बचने की पूरी सम्भावना है
लेकिन देख रही हूँ
भाषा का मेरा मुहावरा
अब भी गढे जाने की प्रतीक्षा में है।

लड़ने को इतिहास से
कम से कम भाषा को
देना होगा मेरा साथ।