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वह / मनोज श्रीवास्तव

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धुओं की बारहमासी बरसात में
अपने पारदर्शी सहोदरों के संग
नहा-ढोधो, खेल-कूद कर
इतना सयाना हुआ था
कि वह भांप सकता था
ज़हरीले कुकुरमुत्तों के जंगल से
जहां समाज-पार के
चुनिन्दा नामूनेदार नमूनेदार समाज
शौक से छल रहे होते हैं--
भूत, भविष्य और वर्तमान
और चुग रहे होते हैं
संस्क्रितियामसंस्कृतियाँ, नैतिकताएं व आदर्श
बस, यही है
गठिया के मीठे दर्द वाले जोड़ों को
और अपनी बपौती में मिली
बेशकीमती इकलौती कमीज़ और पाजामे पर,
वह बता सकता है
सैंतीस चकत्तियों से झांकते हुए सत्तासी छिद्रों को
नोच-नोच अपनी हथेली पर
क्रम से रखता है गिनते हुए
एक, दो, टींतीन , चार ....
अपनी पाठशाला उसे याद है