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रँग गुलाल के
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उनये उनये भादरे
 
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रचनाकार: [[कुमार रवींद्र]]
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रचनाकार: [[नामवर सिंह]]
 
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रँग गुलाल के
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उनये उनये भादरे
और फाग के बोल सुहाने
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बरखा की जल चादरें
बुनें इन्हीं से संवत्सर के ताने-बाने
+
फूल दीप से जले
 +
कि झरती पुरवैया सी याद रे
 +
मन कुयें के कोहरे सा रवि डूबे के बाद रे ।
 +
भादरे ।
  
ऋतु-प्रसंग यह मंगलमय हो
+
उठे बगूले घास में
हर प्रकार से
+
चढ़ता रंग बतास में
दूर रहें दुख-दर्द-दलिद्दर
+
हरी हो रही धूप
सदा द्वार से
+
नशे-सी चढ़ती झुके अकास में
 
+
तिरती हैं परछाइयाँ सीने के भींगे चास में ।
कभी किसी को
+
घास में ।
कष्ट न दें जाने-अनजाने
+
 
+
अग्नि-पर्व यह
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रंगपर्व यह सच्चा होवे
+
पाप-ताप सब
+
मन के-साँसों के यह धोवे
+
 
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हमें न व्यापें
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कभी स्वार्थ के कोई बहाने
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यह मौसम है
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राग-द्वेष के परे नेह का
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हाँ, विदेह होने का
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है यह पर्व देह का
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साँस हमारी
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इस असली सुख को पहचाने
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19:43, 30 मार्च 2013 का अवतरण

उनये उनये भादरे

रचनाकार: नामवर सिंह

उनये उनये भादरे
बरखा की जल चादरें
फूल दीप से जले
कि झरती पुरवैया सी याद रे
मन कुयें के कोहरे सा रवि डूबे के बाद रे ।
भादरे ।

उठे बगूले घास में
चढ़ता रंग बतास में
हरी हो रही धूप
नशे-सी चढ़ती झुके अकास में
तिरती हैं परछाइयाँ सीने के भींगे चास में ।
घास में ।