भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

"सोनवाँ लुटावे दिनमान / रामवचन शास्त्री अंजोर" के अवतरणों में अंतर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=रामवचन शास्त्री अंजोर }} {{KKCatPad}} {{KKCatBhoj...' के साथ नया पन्ना बनाया)
 
 
पंक्ति 3: पंक्ति 3:
 
|रचनाकार=रामवचन शास्त्री अंजोर
 
|रचनाकार=रामवचन शास्त्री अंजोर
 
}}
 
}}
{{KKCatPad}}
+
{{KKCatGeet}}
 
{{KKCatBhojpuriRachna}}
 
{{KKCatBhojpuriRachna}}
 
<poem>
 
<poem>

12:42, 13 सितम्बर 2013 के समय का अवतरण

अतिराली भुइयाँ, झूमेला असमान,
भोरे-भोरे हो, सोनवाँ लुटावे दिनमान।।
बड़ नीक लागे हऊ ललकी किरिनियाँ,
छउकि-छउकि भरमावेले हरिनियाँ।
कुहुकि कोंइलि कुहुकावेले परान,
भोरे-भोरे हो, सोनवाँ......।।

नाधे अनवादि ई वसंत बयरिया,
बहियाँ उठाइ देहिं तोरे बँसवरिया।
मारे सरसोइया करेजवे में बान,
भोरे-भोरे हो, सोनवाँ...।।

कजरारी तिसिया नयन अझुरावे,
मेंहदी के गंध मनवाँ के बउरावे।
पीके मधु मस्त गावे भँवरा अमान,
भोरे-भोरे हो, सोनवाँ...।।

सेमरऽ पलास लाल बन्हले पगरिया,
मन चिहुँकाइ देति आम के मोजरिया,
महुआ टपकि तान दिहलस कमान,
भोरे-भोरे हो, सोनवाँ...।।

लटके अनार लागे सगुनी सिन्होरा,
कतरेला सुगना लुकाइके टिकोरा।
अमरऽ गुलाब के गजब मुस्कान,
भोरे-भोरे हो, सोनवाँ...।।

बहियाँ लफाइ गेहूँ-बलिया बटोर के,
चूमे जनमतुआ मतिन पोरे-पोर के।
अरिए प किसना के सुरहुर मचान,
भोरे-भोरे हो, सोनवाँ...।।