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बारहमासा / शब्द प्रकाश / धरनीदास

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218.

चैत चलहु मन मानि निज, जँह वस प्रान पियारे।
हिल मिलि पाँच सहेलरी, पाँच पाँच परिवार हे॥

छंद:

परिवार जोरि बटोरि लीजै, गोरि खोरि न लाइये।
बहुरि समय सरूप ऐसो, नाजाने, कब पाइये॥
वैसाखहिँ वनि वनि धनी नख सिख करहु सिंगार हे।
पहिरहु प्रेम पटम्बरा, सुनि लेहु मंत्र हमार हे।

छंद:

सुनहु मंत्र हमार सुन्दररि, हार पहिरु एकावरी।
छोड़ि मान गुमान ममता, अजहुँ समुझो बावरी॥
जेठ जतन करु कामिनी, जनम अकारथ जाय हे।
योवन गरब न भूलिये, करिलेहु कछुक उपाय हे।

छह:

करहु कछुक उपाय ता दुख, पाय फिरि पछिताय हो।
गाँठिको ना छूटि है, तब ढूँढते नहि पाय हो॥
अजहुँ अषाढ़ सुबोधु चित, यहि देख हितू न कोइ हे।
अद्भुत अरथ दरब सब, सपन आवनहि होय हे॥

छंद:

अपन नहि कछु सपन सब सुख, अंत चलिहो हारि को।
मातु पितु परिवार पुनि तोहि, डारि है परचारि के।
सावन सकुच करहु जनि धावन पठवहु चोख हे।
वहु दिवस भटकत भवन मेँ, अब न लावहु धोख हे।

छंद:

जनि धोख लावहु चोख धावहु जब कहावहु पीय की।
न तो कोटि करहु उपाय चिंता मेटि है नहि जीव की।
भामिनी तन भरल यौवन, भजहु भादो मास हे।
पति न रहि निज पति बिना, होइ जग उपहास हे॥

छद:

हो रहै उपहास मानिनि मान इतनो जनि करो।
समुझि नेह सनेह स्वामी हरषिले हृदया धरो।
आश्विन विरह विसिनी, मिलहु कपट पट खोलि हे।
जे दिन कन्त रिसाइहेँ, तब मुखहुना बोलि हे॥

छंद:

मुख बोलि नहि कदु आइह, मरमाइहै घर घर घरे।
कूप खनाइबो, अब आगि छप्पर पर परे॥
कातिल कुशल तबहि सखी, जबही भजहु पिय जानि हे।
वहुरि विछोह कबहिँ न होइहि, तब युगहि युग मानि हे॥

छंद:

युग मानि है यह जानि जिय धरि, दानि कोइ न दूसरो।
हित सारि खेत बिसारि अपनो बीज डारत ऊसरो॥
अगहन उतर दिये न सखि हय अबला अवतार हे।
यतन करत बनै न कछु, कठिन कुटिल संसार हे॥

छंद:

कुटिल यहि संसार, वरु जिय जाव योवन अब सही।
निज कन्त जब अपनाइ हैं, चलि आइहैं घर बैस ही।
पूस पलटि पिय आयउ, प्रगटायपरमानन्द हे।
घरे घरे सिगरे नगर सुधि, मेटिया दुख देह हे॥

छंद:

दुःख मेटो चन्द मेटो, फन्द सवनि छुटाइया।
पुलकि बारंबार मिलि, परिवार मंगल गाइया॥
माघ मुदित मन छिन छिन, दिन दिन बढत सोहाग हे।
नैहर को भ्रम भटकिगो, सासुर सक न लगा हे॥

छंद:

नहि लागु सासुर संक सुनु सखि रंक जनु राजा भवो।
निज नाह मिलिया वाँह गर दै, सकल किल्विष दुरिगवो॥
फागुन फरेउ अमिय फर, झरउ साल दुपात हे।
निशिदिन रहत मगन हिये, सो सुख कह्यो न जात हे॥

छंद:

कहि जात नहि सुख महा मूरति जँह ठहराइया।
सुनि विमल बारह मास को गुन, दास धरनी गाइया॥1॥