भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

द्रौपदी विनय / शब्द प्रकाश / धरनीदास

Kavita Kosh से
Sharda suman (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 05:18, 21 जुलाई 2016 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=धरनीदास |अनुवादक= |संग्रह=शब्द प्...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

कौरव अथाई अतताई की दुशासनसो, द्रुपद-सुता को पट खींचो वहि ठाँहरे।
नारी सुकुमारी हिय हारी न सँभारि तन, कोइ न सहाय मानो गाय गहीनाहरे॥
अपती के पति यदुपति राखो अब, मन वच करम करति तोहिँ हाह रे।
धरनिको धरो लाज राखो पति महाराज, ना तो होतिहौं मैं पति हू के हाथ वाहरे॥12॥