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हिंडोल / शब्द प्रकाश / धरनीदास

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172.

अति अदभुत एक रुखवा, कित विपरीत डार।
गरु गम लाग हिंडोलवा, चडुरे मन राजकुमार।
माँझ मँझारे लागिया, प्रेमकि डोरि सुधार।
पाँच सखी सँग भूलहिँ, सहज उक्त झंझकार।
अरध उरध झूँकि झलहि, गहु गहि अधर अधारा।
बिनु मुख मंगल गावहिँ, सखि बिनु दीपक उँजियार।
धरनी जन गुन गायो, पुलकित बारमबार।
जो जन चढेऊ हिंडोलवा, सखि वहुरि न उतरन हार॥1॥

173.

नैहर मोर बड़ सुखिता, हमरो जे बहुत दुलार।
सासुर सुधि नहि जानी, कस विधि व्यवहार॥
सासु सुनिय बड़ दारुनि, ससुर भावै गारि।
देवत देह निहारहि, नंद निपटनर वारि॥
टोले वसहिं सब टोनही, सौति के सिर घरुवार।
हम अवला नवयोवना, कठिन कुटिल संसार॥
रहत वनत न नइहरा, ससुरे कस जाँव।
धरनी धनी सिधि पावै, बालमु बस हि गाँव॥2॥

174.

गरज अषाढ़ जनाइया, प्रीतम समुझि सनेह।
सहज भवन पग डारिया, नख शिख पुलकित देह॥
सावन शब्द सोहावना, दादुर झींगुर मोर।
पिव पिव रटत पपीहरा, अमिय सरिस घनघोर॥
भादौ नव-सत साजिया, कंत सुघर घर मांहि।
सकल कल्पना मेटिया, मेंटि कलप तरु छाँहि॥
आश्विन आश पुराइया, पुरबिल पूरन भाग।
धरनी तिन तिन झूलिया, जिन जिन उर अनुराग॥3॥