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इबादत की तो ऐसा हुस्न सूरत में चला आया / उत्कर्ष अग्निहोत्री

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इबादत की तो ऐसा हुस्न सूरत में चला आया।
जिसे ख़ुद देखने आईना हैरत में चला आया।

अदीबों की सभा में क़त्ल होगा आज उसका ही,
उसे मालूम था फिर भी मुहब्बत में चला आया।

जहाँ हर फैसला हो ताकतों के हाथ का मोहरा,
वहाँ इंसाफ़ लेने वो अदालत में चला आया।

निगाहों में सभी की कल तलक जो बेशक़ीमत था,
वही बाज़ार में छोटी सी कीमत में चला आया।

हमारे देश के हालात बदतर इसलिए हैं अब,
यहाँ जो जादूगर था वो सियासत में चला आया।

तुम्हें रास आए मेरी शख़्सियत तो ये समझ लेना,
बुज़ुर्गों से बहुत कुछ मेरी आदत में चला आया।