भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

नाविक (साहस) / शिशु पाल सिंह 'शिशु'

Kavita Kosh से
Lalit Kumar (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 12:02, 13 जून 2018 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=शिशु पाल सिंह 'शिशु' |अनुवादक= |संग...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

दीखता है कि घटायें, घटाटोप, लेकर घन घुमड़े हैं;
मिलाने को मेघों से हाथ, ऊर्मियों के उर उमड़े हैं।
निशा के काले केश, हरेक दिशा पर परदा डाले हैं;
बिजलियों के मतवाले रोष, सँभाले भीषण भाले हैं।

प्रभंजन के झोंके वीभत्‍स, ठहाका भर हहराते हैं;
धार का जल उभार कर, घोर अमा में ज्‍वार उठाते हैं।
लिये भूकम्‍पों के आवेश, कगारों से टकराते हैं;
कज्‍जलों के शिखरों पर चढ़े, प्रलय के शंख बजाते हैं।

नेत्र मुँदने पर चारों ओर, तिमिर जैसे छा जाता है;
पलक खोले भी उसी प्रकार, न तम में कुछ दिखलाता है।
किन्‍तु नाविक कब शंकित हुआ, विघ्‍न की इन बौछारों से;
जुड़ गया पल भर में सम्बंध, बाहुओं का पतवारों से।

हठीले साहस ने दूसरे पार को, धावा बोल दिया।
ठान कर संगर तूफान से, नाव का लंगर खोल दिया॥