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माथे पर सिकन हाथों में गुनाह / शक्ति बारैठ

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बहेड़े ने केवडे से कहा
वो देख कहाँ उग गया बियाबान रेगिस्तां का राजा
बीहड़ों के खानदान का, लाल केसरिया रोहिड़ा,
परजा की जड़ें औरतों की खाट है
फिर क्यों माथे के सहारे की खातिर,
पहाड़ों पर बरगद नहीं होते
मगर बारामूला का लेखक लिखता जरूर है,
ढहते मक़ान, जंग लगे ताले
क़बीले की बैठकें, चौपाल पर मंडे बुजुर्गों के
पाँवों के निशान
उँगलियों पर गिनी जा सकने वाली
साँझ की शांति,
कौन ले उड़ा, कालांतर की अंधेरी कन्दराओं की और, बहुत दूर।
तिब्बत का मंदिर, ढाका की रिवायतें,
शहर सा फीकापन, आदमियत सा कसैला कड़वा घूंट,
अधजला लहसुन में लिपटा मांस,
पके चावल, थैली में मुर्दे का माथा, और दिल मे फ़रेबी का मरा हिरन कुलांचें क्यों मारने लगता है .
कद्दावर देह, चमड़ी पर बरसे ओलों के निशान
छोटी आँखों में जागता ख़ौफ़, डर, कुटिलता,
माथे पर शिकन हाथों में गुनाह के राक्षशों सा नाचता अपराध,
सो ही नहीं पाता कभी, चीर गहन निंद्रा में ।
पहाड़ के पेड़ पनाह नहीं देते
ठीक रेगिस्तां की दीवारें सुकून नहीं देती,
खुले केश, झाड़ियां, झरने, हरा पानी और अदबी
डूबती खेलती उछलती मछलियां, लड़कियां
तकते सियार, मगरमच्छ, लाल माटी, सांपों का
अथक निश्वार्थ इंतेज़ार
हरड़ चिड़ियां, काँधे पर बंदूक, सफेंद जांघिया,
गश्त धरपकड़ हड़बड़ाहट और छुप जाना
झुरमुरों की ओट में,
चिड़ियों तो कभी लड़कियों का, हिरणों का
झुरमुटों की ओट में।
सीटियां बज रही है, साड़ियां निचोड़ी जाती रही
बरामदे में गुहाल की छान गिर पड़ी,
फूलती सांसे, आग भरी छातियाँ, कसते सिकंजे
सिकुड़ती उँगलियाँ, रेंते गये गले, उखाड़ी गई जड़ें,
तोड़े गये जबड़े, कोहनियां, उखाड़े गये पंख, जलाई गई गाड़ी, फेंक दी गई मंडराते बाजों को
गांव का नायक खिलखिला उठा,
ओहदों की सलामी लगी, कोपीन पर पुराना कौट आ गया,
माथे पर पगड़ी,
आपके मस्तिष्क सीतल रहें आपकी जवानी अमर रहे
आप डौम हुए, ओरण-ए-पहाड के नए डोम,
सब झूंट
सब निरर्थक, सब कलंकित, सब खत्म, सब झूठ
आग की छाया होती
तो दिखती मेरी भी कविता के यथार्थ की परछाई
जैसे पहाड़ों पर बरगद नहीं होते
मगर समंदर किनारे रेत तो हुआ ही करती है।