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200.

बालमु मोहि बहुत विसारी।टेक।
जबते गवन कियो मोरे प्रीतम, वहुरि न सुरति सँभारी।
बारह बरस बालपन बीते, अब जतु बात न भारी॥
कवहुँक चलत परै पग नीचे, तब गति कवनि हमारी।
तुम प्रभु नागर सब गुन आगर, हम धनि नारि गँवारी॥
दीजै दरस परस पुरुषोत्तम, धरनी धनि वलिहारी॥1॥

201.

मन वसु रे अगम अटारी।टेक।
मनि वरे दीप दिवस ना राती, हृदय कमल निरुआरी।
अजपा लहर उठे जेहि सरवर, अलख पुरुष मठधारी॥
नव नाड़ी को द्वार नव रोधो, लाओ सुषमन तारी।
अनहद नाद नगारो बाजै, गगन गरज धुनि भारी॥
संपत पूरा ब्रह्मा विराजै, ध्यान धरै त्रिपुरारी।
धरनी शब्द श्रवन करु मूरख, ना तरु हनेउ कुठारी॥2॥

202.

तेहि देश वसंतहि खेलना, तेहि देश वसी, जँह रात दिना ना होय।
जँह धरती नहीँ अकासा। नहि अगिन पवन परकासा॥
जँह सुरुज चाँद नहि तारा। बिनु दीपक ही उँजियारा॥
जँह बिनु जल कमल फलावा। तँह मन मधुकर अरुझाना॥
जँह अधर अखंडित सोहै। तँह मुनि मन मानस मोहै।
एक पँखी है बिनु पँखा। तँह मोती झरहि असंखा॥
जँह चमकै विज्जू रेखा। तँह वस्तु अदेखी देखा॥
जँह कर्म धर्म नहि पापु। जँह जपि लेहु अजपा जापू॥
धरनी तको पूरन भागा। जको उर उपजो अनुरागा॥3॥

203.

एक सरवरमो मन माना। जको सुर मुनि करत बखाना॥
जँह ओड न कोडत कुदारी। तँह मानसरोवर भारी॥
अति विकट न सूझै वाटा। विनु गुरु गम लखै न घाटा॥
अति निर्मल जल अवगाहा। विरले जन पावहिँ थाहा॥
तँह कीच सेवार न कीरा। कबहूँ जल तात न सीरा॥
वहि सरवर जन जब पावै। तँह तन मन ले नहवावै॥
तहवाँ जो जाय नहाना। तौ आवागवन नसाना॥
जँह धातु पषान न काठी। एक माँझ मँझारे जाठी॥
तहवाँ सबसे वैरागी। धरनी तासों लो लागी॥4॥

204.

कछु कहत नहीं बनि आवै। जको पूरन भग सो पावै॥
गुरु गम एक द्वार उबरे। तँह देखो अगम सुमेरु॥
कनि दीप वरै चहुँ ओरा। एक ऊपर नाचे मोरा॥
एक वृक्ष वह विस्तारा। जरि ऊपर है तर डारा॥
तेहि छाल न पात न फूला। फलएक अमिय जँहा मूला॥
एक सिन्धु गहिर गंभीरा। तेहि वैरा नाव न तीरा॥
विरले जन पावहिँ पारा। सोतो वहुरि न अतरनिहारा॥
सुख मूरति सुन्दर सीऊ। निरजीव कहो कस जीऊ॥
तेहि देखि मगन मति मोरी। धरनी विनवै कर जोरी॥5॥

205.

एक दीरघ कोट सोहावै। जेहि सातो दीप समावै॥
बहु खंधक बहु दर्वाजा। गढ़ भीतर है एक राजा॥
गुरु गम विरले जन जाई। द्युति देखि रहत सहमाई॥
एक बाभन नव गुन धारी। वे अच्छर पढ़त विचारी॥
वहि अच्छर भेद जो जाना। तेहि वेद नहीं मन माना॥
सोइ साँचा मूसलमाना। वहि हरफ-हकीकत जाना॥
जोपै मानै मनहि विचारा। धरन रखै तीस सिपारा॥
अमि-अंतर सुरति सनीधा। तँह ठाढ़ रहै एक सीधा॥
अति-रूप अनूप सुधारी। धरनी तिनकी वलिहारी॥6॥

206.

चित चिन्तामनि को चेरो। अब नहि भावै वहुतेरो॥
हिन्दू ना मूसलमाना। पहिचानत ही मन माना॥
....। वपुरा विनु दाम बिकाना॥
तँह बिनु कर बाजन बाजा। बिनु पायन किरतन छाजा॥
बिनु जिह्वा गावत गीता। बिनु अस्त्र महा अरि जीता॥
निरखो जिन बिनहि दुवारा। बिनु दीपक भौ उँजियारा॥
वरषै तँह अमृत धारा। कोइ जानै जाननि हारा॥
सो सोवत गगन मँझारा। सबहूते रहत नियारा॥
तंह पूरन ब्रह्म विचारी। धरनी शरनागति धारी॥7॥

207.

वहुरंगी राम हमारा। सब संतन प्रान-अधारा॥
धु्रव को दिहु राज अखंडित। हरिनाकसहीँ हिय फारा।
दुःशासन गर्व मेटाओ। पुनि अंबर लागु अपारा॥
द्वारावति मन्दिर फेरा। जेहि पच्छिम कीन्ह दुवारा॥
पंडित को परपंच नत्यागो, वन आये बनिजारा॥
मोरध्वज कंह कीन कसौटी, देह धरायो आरा।
मेटत जन जयदेव को आछर, सेने पानी ढारा॥
तिरलोचन को विरुद बँधाओ, गनिका गुन न विचारा।
दुर्वासा को फेरि पढ़ाओ, अम्वरीष दर्वारा॥
पाण्डव के घर घंट बजायो, सेनि सरूप सँवारा।
चना धनाके खेत जमाये, गहि गजराज निकारा।
पीपा के तन पाप बुझाओ, छाप दियो टकसारा।
अलल भक्त को फल ले जाओ, भुँइ पहुँचाओ डारा॥
जन रैदास प्रतिज्ञा राखी, साखी सब संसारा॥
समुझि सदन को काज सुधारो, चलि भौ देत नगारा।
”बाई“ को विष अमृत कीनो, नरसीसाँ व्यवहारा।
धरनी अपने रामनामपर, तन-मन जीवनहारा॥8॥

208.

हम सुतली धवराहर, जंह दहु दिशि रखवार।
सपन सोतुख मैल, पुरुष प्रगट मैल बैठल से पलँग-मँझार।
बोलिया वोलत सुबौलिया, शक परल मोरे कान।
नयनन देखल नजर भरि, सुखत रहल मन मोर।
जस जानल तस छानल, कल वल कछु न सोहाय।
कहहु जो जेहि मन भावेल, मोहि नहि अवर सोहाय।
धरनि धनी धनि व्रत भैलि, पुनि अति सेहु पतियाय॥9॥

209.

हम उमतैली हम उमतैली हम उमतैली भाई रे।
हमरा संगे मति कोउ लागे, जाके चित चतुराई रे।
धरको ब्रह्म भूत होइलागल, को करि सकै निकाई रे।
बड अभुताह मेँ जानल, जे न अजहुँ पतियाई रे।
जे उमतइले नाम देव, कबिरा, जयदेव मीराबाई रे।
जे उमतइलै संत घनरेरो, अगनित गनि न सिराई रे।
धरनी कहे सुनो संतो, सुनो सकल दुनियाई रे।
अवर भले मँदे ना कछुवो, जौ जदीश सहाई रे॥10॥

210.

होँ बंगालिन बसाँ बँगाले, धुर पुर वारत आवँरे।
जो नर नारि प्रचारि मिलै, तँह गुन अपन चलावरे।
शब्द-सनेह पानि पढ़ि डारो, युक्ति जड़ी धँसि प्याव रे।
नयनन हेरि हरो मन ताको, बोलि वचन अपनाव रे॥
गोआ आन खियाय तुरत तँह, भवजल नदी सुखाव रे।
शंभु सरीखे जो होइआवै, गाडर करि दिखराव रे॥
तौ साँची सत-गुरुकी सेवकिनि, गगन को तार तोराव रे।
धरनि धनी अति विरह-वियोगिनि, योगिनि तबहि कहाँवरे॥11॥

211.

कहा कहाँे कछु कहिबो न जाय।
चरन सरन सुमिरत जिय दीनो, बिनु मसि विपरित आँक बनाय॥
बिनु वाजन अतिशब्द गहागह, सुनि सुनि पुनि पुनि अध्किा सोहाय।
त्रिकुटि को ध्यान, पिहान उधरि गो, जगमग जोति जराय॥
सनमुख रहत सोलोनी मूरति, तेहि जियरा ललचाय।
धरनीदास तासु जन बलिबलि, जे रघुनाथ के हाथ बिकाय॥12॥

212.

हरि अस प्रीतम कस बिसराया।
जिन प्रभु जलहुते युक्ति बनाया। हरि-रतन मनि मानिक लाया॥
जठर अगिनतनु जरत बचाया। पहिल पहर जिन लाड़ लड़ाया॥
दूजे विषरस घोरि पियाया। तीज पहर जिन पलटि जगाया॥
जिन प्रभु उर अनुभव उपजाया। मोह मया ममता बिगराया॥
दह दिसि प्रगट भई जकि दाया। गुरु परसाद शबद एक पाया॥
मन वच क्रम तँह मन ठहराया। धरनी साधु-संगति गुन गाया॥13॥

213.

डरारि चललि धनि मधुरि नगरिया, बिच सँवरा मतवरवा हो ना।
अटपट चलनि लटपटी बोलनि, धाय लगल अँकवरिया हे ना।
साथ सखिय सब मुखहु न बोलै, कौतुक देखि भुलनि हे ना।
मदकेरि वास लगलि मोरि न किया, जाय चढ़ल ब्रह्मंड हे ना॥
तबहिते धनि भैली मतवरिया, मद बिनु रहल न जाइ हे ना।
प्रेम मगन गावै जन धरनी, करि लेहु पँडित विचार हे ना॥14॥

214.

देखो भाई हृदय विचारी।
परम पुरुष परमेश्वर परिहरि, अवर न कोई हितकारी।
बहुत जन्म जग जन्मि जहाँ तँह, समुझि परीयहि पारी॥
काको मातु पिता दुहिता सुत, बंधु बहिन वर नारी।
धरनी साधु संगति सच पावत, नहि भावत संसारी॥15॥

215.

वाहि मिले सो यार हमारा।
जो प्रभु आदि अंत रखवारा॥
ताकी काहे न करत चाकरी, जाकी दुनिया सारी।
बिनु घोड़े असवार लिखावै, वबे जामिन इतबारी।
बाँधे अस्त्र भुजाली रैयत, बिनु हथियार सियाही।
हुकुम करै सो टरै न कैसहुँ, युग युग की बदशाही॥
बैठा आपु तमाशा देौ, आठ पहर दरबारा।
सबके अंतर की गति जानै, ऐसा परिखनहारा।
खिदमत जाहि जहाँ जेहि लायक, ताहि तहाँ फरमावै।
सुरति करै ना गाफिल जिय की, चौरासी पहुँचावै।
दैत इनाम नाम जो जानै, ताको काज सुधारै।
अपने हाथ हाथ धरि ताके, तख्त उपर वैठारे॥
हिन्दू तुरुक दुवो हम बूझो, समुझ पुरान कोराना।
धरनीदास आस सब छोड़ी, साधु संगति मन माना॥16॥

216.

साधु सकल संसार सगाई। भरमत भूलि परे दुनियाई।
सोचि विचारि नारि नर देखो, कौन काहिसोँ नाता।
प्रीति करै से पिता कहीजै, मते मिलै सो माता॥
भाव करै सो भाई कहिये, बहिन कबहिँ न विसारै।
विलग न होइ सो बेटा बेटी, बहू वचन प्रतिपारै॥
दया करै सो दोस्त कहीजै, प्रनधारी परिवारा।
जाति गोत कुल मूल वरन विधि, कौन करै निरुवारा।
ज्ञान लखोवे गुरु कहीजै, चित लावै सो चेला।
धरनी देह धरे कहि आवै, ना तरु सबहि अकेला॥17॥