भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

राम सहाय तो भय व्यर्थ / शब्द प्रकाश / धरनीदास

Kavita Kosh से
Sharda suman (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 05:47, 21 जुलाई 2016 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=धरनीदास |अनुवादक= |संग्रह=शब्द प्...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

हाथि कन्ध पाय सोन श्वानते शँकाय, वान चंदको चलाय तौ जलाय आपुही ढरै।
रूखी जो रुखाय रूख सूख तो न जाय, धरनी कहै वजाय श्वान लाय सिंह को लरै॥
छोरि मुख वाय तो न काँहडा समाय, जोन्हि जाल क्याँ बझाय जौ उपाय कोटि कै मरै।
मँढकी सुआय जोट ऊँटते न खाय, एक राम जो सहाय तो रिसाय कोउका करै॥34॥