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नयन में उमड़ा जलद है / वर्षा सिंह

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नयन में उमड़ा जलद[1] है ।
नभ व्यथा[2] का भी वृहद[3] है ।

आँसुओं से तर-बतर है
यह कथानक[4] भी दुखद है ।

इस दफ़ा मौसम अजब है
आग मन में तन शरद[5] है ।

दोष क्या दें अब तिमिर[6] को
रोशनी को आज मद[7] है ।

नींद को कैसे मनाएँ
ख़्वाब की खोई सनद है ।

त्रासदी ‘वर्षा’ कहें क्या ?
शत्रु अब तो मेघ ख़ुद है ।

शब्दार्थ
  1. बादल
  2. पीड़ा, दुख
  3. बड़ी
  4. कहानी
  5. ठंडा
  6. अंधेरे
  7. नशा