भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

408 / हीर / वारिस शाह

Kavita Kosh से
Lalit Kumar (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 13:57, 5 अप्रैल 2017 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=वारिस शाह |अनुवादक= |संग्रह=हीर / व...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

वांदी हो के चुप खलो रही ऐं सहती आखदी खैर ना पायो कयों
एह तां जोगीड़ा नीच कमजात कंजर, एस नाल उठ भैड़ मचाया कयों
आप जा के देह जे हई लैंदा घर मौत ऐ घत फसायो कयों
मेरी पान पत एस ने लाह सुटी जान बुझ बेशरम करायो कयों
मैं तां एसदे हथ विच आन फाथी मास शेर दे हथ फहायो कयों
वारस शाह मियां एस मोरनी दे दुआले लाएके बाज छुडायो कयों

शब्दार्थ
<references/>