भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

नूपुर-हीन चरण ये छोटे / विमल राजस्थानी

Kavita Kosh से
Lalit Kumar (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 11:40, 19 फ़रवरी 2016 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=विमल राजस्थानी |अनुवादक= |संग्रह=...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

तुम स्वामी स्वाधीन देश के
मैं नारी आजाद वतन की
तुम मधुमास, रास के प्यासे
मैं बहार वीरान चमन की

राम-राज्य के चित्र तुम्हारी-
पलकों पर अब नहीं झूलते
कुरुक्षेत्र की जय-गाथायें-
दिन-दिन तुम जा रहे भूलते

क्रांति सफल हो गयी, राष्ट्र-
को जब नूतन निर्माण चाहिए
नव जागृति, बल, ओज नवल
नव स्वर्णिम सुखद विहान चाहिए

तुम रस गये तभी चाँदी-सोने-
की नश्वर चमक-दमक में
मान मुझे भी बैठे केवल-
रति-सुख साधन मात्र सनक में

देख तुम्हारी और घृणा से
मेरा क्रोध उमड़ आता है
ओ कायर! ऊपर-ऊपर से-
क्रांति-क्रांति क्यों चिल्लाता है

ओ मदहोश! जनक पापों के
छल-छùों के चिर अभ्यासी
आदि शक्ति को मूर्ख! समझ-
बैठा है तू चरणों की दासी!

देख-अभी भी फड़क रही हैं
मेरे तन की अग्नि-शिरायें
कौंध रही आँखों में बिजली
फड़क रही हैं दसों भुजायें

जी करता-चूड़ियाँ फोड़ दूँ
वेणी खोल बिखेरू अलकें
लगातार ज्वाला बरसायें
मुँदें न एक निमिष को पलकें

मेहँदी के बदले हाथों में-
दुश्मन के लोहू की लाली
केसरिया बाना हो तन पर
भस्मिभूत हो गोटा-जाली

छप-छप-छप असि चले, भूमि-
पर कट-कट शीश शत्रु के लौटें
औ उनको ठोकर से मारें
नूपुर-हीन चरण ये छोटे

अट्टहास करती बिजली-सी
चमक-दमक मरघट में घूमूँ
देश-द्रोहियों का शोणित पी
काल भैरवी सी झुक-झूमूँ

उगलूँ आग, गरल बरसाऊँ
दबी सर्पणी-सी फुफकारूँ
समरांगण में डट, गिन-गिन-
कर एक-एक दुश्मन को मारूँ

मैं न पùिनी, सजूँ चिता जो
मैं तो बहन रुद्र की छोटी
अपने भैया के चरणों पर
काट चढ़ा दूँ बोटी-बोटी

मैं जिस क्षण हुंकार करूँगी
थर्रायेंगी दसों दिशाएँ
डोलेगा भूगोल गगन में-
तारे टूट-टूट टकराएँ

तुम हो पिता, देख सकते हो
अपने बच्चों की बर्बादी
तुम हो पुरुष, प्रसन्न बने-
रह सकते हो पाकर आजादी

किन्तु, देख सकती है माता-
कभी न लालों को बिललाते
अधनगों-भूखों की टोली-
को रोटी-रोटी चिल्लाते

क्या है जो पय नहीं उरोजों में,-
मैं रक्त पिला पालूँगी
अमृत-कलश पाने को, पल में-
सप्त-सिन्धु मथ-मथ डालूँगी

निद्रा-ग्रस्त विधाता को-
झकझोर जगा दूँगी क्षण-भर में
सुख-श्री का अम्बार लगा-
दूँगी मैं भारत के घर-घर में

घर-घर में ही क्या, पत्ते-पत्ते पर-
घी के दीप जलेंगे
झिलमिल दीपों के प्रकाश में-
युग-युग के सुख-स्वप्न फलेंगे

पुरुष! तुम्हारे साथ-साथ
देखेगा अचरज भरा जमाना
महाक्रांति के साथ-साथ
आता माँ को निर्माण सजाना

-‘विजयादशमी’
17.10.1953