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प्यार बिना है भार ज़िन्दगी / महावीर प्रसाद ‘मधुप’

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प्यार बिना है भार ज़िन्दगी शोक भरे संसार में,
हर सूखी जीवन-बगिया को मधुर बसन्त-बहार दो।

कोई नहीं पराया, सारा जग अपना परिवार है,
एक डाल के पंछी हम सब एक बाग के फूल हैं।
कोई छोटा और बड़ा क्या, ऊँच-नीच की बात क्या?
एक गगन के सभी सितारे, एक धरा की धूल हैं॥
जाति-पाँति के भेदभाव की सब दीवारें तोड़ कर,
मानवता का मान बढ़ा, हर मानव को सत्कार दो।

प्यार बिना है भार ज़िन्दगी शोक भरे संसार में,
हर सूखी जीवन-बगिया को मधुर बसन्त-बहार दो।

झुलस रही हर मन की लतिका दुश्चिन्ता की आग में,
बरस रही हर एक नयन से आँसू की बरसात है।
आह-कराहों का पहरा है अधरों की मुस्कान पर,
चिरवियोग की कारा में बन्दिनी मिलन की रात है॥
डूब रहा हो भग्न हृदय जो दुख के पारावार में,
स्नेह सहित उसके हाथों में साहस की पतवार दो॥


प्यार बिना है भार ज़िन्दगी शोक भरे संसार में,
हर सूखी जीवन-बगिया को मधुर बसन्त-बहार दो।

झलक रही हों श्रम की बूंदे जिनके गर्वित भाल पर,
बढ़ते हुए डगर पर अविरल पाँव थकन से चूर हों।
विचलित करती हों पल-पल में बाधायं सब ओर से,
दूर बहुत हो मंज़िल फिर भी चलने पर मजबूर हों॥
कर्मयोग के साधक ऐसे मिलें जहाँ जिस राह में,
पथ के सब काँटे बुहार कर, फूलों का उपहार दो॥


प्यार बिना है भार ज़िन्दगी शोक भरे संसार में,
हर सूखी जीवन-बगिया को मधुर बसन्त-बहार दो।

झाँक रहा है मरघट का सूनापन जिसके द्वार से,
स्वर्ग बना दो उस आँगन को स्वर देकर संगीत का।
द्वेष-घृणा का ज़हर भरा है मानस के जिस पात्र में,
तुम अमृत-सा रस छलका दो उसमें पावन प्रीत का॥
टूट चुकी हो उर-तन्त्री जो उसे नई झनकार दो।
गीत विजय के जो गाये, उसकी आरती उतार दो॥


प्यार बिना है भार ज़िन्दगी शोक भरे संसार में,
हर सूखी जीवन-बगिया को मधुर बसन्त-बहार दो।
सदा वहाँ पर जियी हो पाता बस केवल प्यार है,
मिला न करती जहाँ सफलता भय से दंड-विधान से।
हो जाता बल जहाँ पराजित ज्ञान और विज्ञान का,
हर मुश्किल आसान वहाँ होती मोहक मुस्कान से॥
गिरे हुओं को फिर से ऊपर उठने का आधार दो।
स्वयं जिओ औरों को जग में जीने का अधिकार दो॥


प्यार बिना है भार ज़िन्दगी शोक भरे संसार में,
हर सूखी जीवन-बगिया को मधुर बसन्त-बहार दो।