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बेआवाज़ कोठरियाँ / नजवान दरविश

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वह टँगी है अब भी काठ की एक टिकठी पर
और मैं कुल मिला कर महज चीख़ ही सकता हूँ
इन कोठरियों को कोई आवाज़ बेध नहीं पाती

रात-दिन
सर्दी और गर्मी में
वायु, अग्नि, पृथ्वी और जल में
अन्धेरे और उजाले में
अब भी टँगी है वह :

यह दुनिया टँगी हुई है काठ की एक टिकठी पर

अँग्रेज़ी से अनुवाद : राजेश चन्द्र