भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

बैठ खिड़की पर अकेली सोचती चिड़िया / मधु शुक्ला

Kavita Kosh से
अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 01:09, 30 जनवरी 2024 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=मधु शुक्ला |अनुवादक= |संग्रह= }} {{KKCatGha...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


बैठ खिड़की पर अकेली सोचती चिड़िया ।
नीड़ का कोई ठिकाना खोजती चिड़िया ।

पोछकर आँसू, भुलाकर ज़ख़्म काँटों के,
आस के तिनके दुबारा जोड़ती चिड़िया ।

हल नहीं मिलता कोई, जब भी सवालों का,
चिड़चिड़ा कर पंख अपने नोचती चिड़िया ।

उड़ गए साथी कहाँ वो, आसमानों के
खिड़कियाँ यादों की रह-रह खोलती चिड़िया ।

छोड़कर उड़ना, फुदकना, चहचहाना अब
बैठ गुमसुम पंख अपने तोलती चिड़िया ।

तिर रही है पुतलियों में एक दहशत सी,
मौन रहकर भी बहुत - कुछ बोलती चिड़िया ।

धूप, छाया, फूल, ख़ुशबू और मौसम के
संग मीठा एक रिश्ता जोड़ती चिड़िया ।

देखकर यह बेरुख़ी आँगन - मुण्डेरों की,
रुख़ उड़ानों का अचानक मोड़ती चिड़िया ।