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शंख-निनाद / केदारनाथ मिश्र 'प्रभात'

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सुनो, हुआ वह शंख-निनाद!
नभ के गहन-दुरूह-दुर्ग का
द्वार खुला कर भैरव-घोष!
उठ मसान की भीषण-ज्वाला
बढ़ी शून्य की ओर सरोष!
अतल-सिन्धु हो गया उत्थलित
काँप उठा विक्षुब्ध-दिगंत!
अट्टहास कर लगा नाचने
रक्त-चरण से ध्वंसक-अंत!

कवि का है यह शंख-निनाद!
यह स्वतंत्रता का सेवक है
क्रान्ति-मूर्ति है यह साकार;
विश्व-देव का दिव्य-दूत है
सर्वनाश का लघु-अवतार!

प्रलय-अग्नि की चिनगारी है
सावधान! जग आँखें खोल;
देख रूप इसका तेजोमय
सुन इसके संदेश अमोल!

भाग रे कपट, भाग विद्रोह!
भाग दुनिया के मिथ्या-मोह!
अग्नि-कुंड में कूद मंत्र पढ़
आती विजय दिखा आह्लाद
द्वार स्वर्ग के खुले हुये हैं

सुनो, हुआ यह शंख-निनाद!
25.3.28