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सभा में होली है / विष्णुचन्द्र शर्मा

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सभा मूक है
दूर फाग का चाँचर गाता हंस
अकेला देख रहा है

उदर में होलिका लगी है।
चेहरे पर गाढ़ा रंग धुएँ का
कटे हुए हाथ से फेंका है गुब्बारा।
उछल कर गिरा है कबंध रंगभूमि में।

सभा में होली है
होली खेलते धड़
गोली से बिंधे हैं।

सोचता है हंस
दीन बित्तहीन हूँ साल-दर-साल से।
जहाँ कहीं जाता हूँ: काम नहीं।
जीने को अब कोई ठौर नहीं।
सोचा था सभा में
होली में थोड़े से गुब्बारे बेचकर
बच्चों में हँस-बोल रंग खेल
अपना क्रोध का चेहरा थोड़ा बदल जाएगा।

थोड़ा-सा निडर होकर कारखाने में महतू से
खेती की पाठशाला के कर्मचारी समई से,
नाराज सामन्त से,
करनपाल बनिये से
अपने पुराने और आज के घाटे का
हिसाब कर लूँगा!
होगा तो कर्ज का खाता ही देखूँगा!
होगा तो महतू के जुलूस में नारे नए सीखूंगा!
होगा तो समन्त से चीन की-तीसरी दुनिया के
अपने पड़ोसी की-बातें ही सुनूँगा!
सुनकर कुछ गाने ही गाउँगा?
होगा तो समई से पूछूँगा: खेत में, रेतीली जमीन में,
खादर जमीन में रेह को मारने वाली कौन-सी खाद अभी खोजी है
तुमने!
कौन से गेहूँ का बीज इस बार बोया है सोहना किसान ने!
कौन-सा धान इस बार काटा है समर घोष ने!
मनई ने इस बार कहाँ पर झोपड़ा डाला है!
सोचा है हंस ने
वास तो रात में रोज खोज लेता हूँ
दिन भर इस बार कुछ बतकही होगी गर्म
सभा में!

सभा में हठी एक नेता ने गदहे को माला पहनाई थी!
गदहे ने मन की गाँठ खोली थी।
भ्रम के कई कोनों से चेहरे उतार कर
गदहे ने कहा था: ”नेता अभी
अपने अभिमान की गाँठ नहीं खोलता है।
नेता अभी अंधेर नगरी के भीतर कहीं रहता है।
नता अभी गोली से बोलता है, लाठी से खेलता है,
तूफानी दौर में लाशों को फेंकता है,
हवाई यात्रा में अपने बचाव की भूमिका गढ़ता है।
नेता अभी अपने अभिमान के घर से संसद तक आया है।
नेता अभी धोखे की टट्टी बना घर में आरक्षित है
दासों के घेरे में।
नेता अभी संसद में नंगा है हरे-हरे पत्तों से प्रवचन की छाया लेते!
नेता अभी प्रजातंत्र की छड़ी में लासा लगा फाँसता है दास को,
अपने गुणगान गाते चाकर को।
नेता अभी जिसने मुझे अपनी औकात का दर्जा दिया
मेरी तरह मिथक है झूठ का।
नेता अभी अपनी औकात में असली बहेलिया है।“

सभा में नेता ने बच बचकर रंगा है गदहे को।
बच-बचकर भीड़ ने घेरा है पुलिस को।
बच-बचकर गदहे ने दुलत्ती मारी है।
धड़ों से छूट कर भागे हैं हाथ!
नेता ने गदहे ने,
जनता ने, हंस ने बचकर चाँचर गाया है फाग का!

सभा मूक है
दूर फाग का चाँचर गाता हंस
अकेला देख रहा है:

उदर में होलिका लगी है...

-जानवरतंत्र से