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सुंदर काण्ड / भाग 4 / रामचंद्रिका / केशवदास

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चंचरी छंद

वान धामनि आगि की बहु ज्वाल-माल विराजहों।
पौन के झकझोर तैं झँझरी झरोखन भ्राजहीं।।
बाजि बारन सारिका सुक मोर जोरन भाजहीं।
छुद्र ज्यों बिपदाहि आवत छोड़ि जात न लाजहीं।।61।।

लंका दाह

भुजंगप्रयात छंद

जटी अग्निज्वाला अटा सेट है यौं।
सरत्काल के मेघ संख्या समै ज्यौं।।
लगी ज्वाल धूमावली नील राजैं।
मनौ स्वर्ण की किंकिणी नाग साजैं।।62।।
कहूँ रैनिचारी गहे ज्योति गाढ़े।
मनौ ईस रोषाग्नि मैं काम डाढ़े।।
कहूँ कामिनी ज्वालामलानि भारैं।
तजैं लाल सारी अलंकार तोरैं।।63।।
कहूँ भौन राते रचे धूम-छाहीं।
सती सूर मानौं लसैं मेघ माहीं।।
जरै सस्रसाला मिली गंधमाला।
मलै अद्रि मानौ लगी दाव ज्वाला।।64।।
चली भागि चौहूँ दिसा राजरानी।
मिलीं ज्वाल माला फिरै दुःखदानी।
मनो ईस बानावली लाल लोलैं।
सबै दैत्य जायान के संग डोलैं।।65।।

सवैया

लंक लगाइ दई हनुमंत विमान बचे अति उच्चरुखी ह्वै।
पावक मैं उचटैं बहुधा मनि, रानी रटैं ‘पानी’ ‘पानी’ दुखी ह्वै।।
कंचन को पघिल्यो पुर पूर, पयोनिधि मैं पसरो सो सुखी ह्वै।
गंग हजारमुखी गुनि, केसौ, गिरा मिलि मानौ अपार मुखी ह्वै।।66।।
(दोहा) हनुमत लाई लंक सब। बच्यो विभीषन धाम।
ज्यौं अरुनोदय बेर मैं, पंकज पूरब याम।।67।।

संयुक्ता छंद

हनुमंत लंक लगाइ कै। पुनि पूछ सिंधु बुझाइ कै।
शुभ देख सीतहि पाँ परे। मनि पाय आनंद जी भरे।।68।।
रघुनाथ पै जब ही गये। उठि अंक लावन को भये।
प्रभु मैं कहा करनी करी। सिर पाय की धरनी धरी।।69।।
(दोहा) चिंतामनि सी मनि दई, रघुपति कर हनुमंत।
सीताजू को मन रँग्यौ, जनु अनुराग अनंत।।70।।

सीता संदेश

घनाक्षरी

भौंरनी ज्यौं भ्रमति रहति बनबीथिकानि,
हंसिनी ज्यौं मृदुल मृनालिका चहति है।
हरिनी ज्यौं हेरति न केसरी (सिंह, केशर) के काननहिं,
केका सुनि ब्याली ज्यौं बिलानहीं चहति है।।
‘पीउ’ ‘पीउ’ रटत रहति चित चातकी ज्यौं,
चंद चितै चकई ज्यौं चुप ह्वै रहति है।
सुनहु नृपति राम बिरह तिहारे ऐसी,
सूरतिन (सूरतों, दशाओं) सीताजू की मूरति गहति है।।71।।
(दोहा) ‘श्रीनृसिंह प्रह्लाद की, वेद जो गावत गाथ।
गये मास दिन आसु ही झूँठी ह्वैंहै नाथ’।।72।।

दंडक

राम- साँचो एक नाम हरि लीन्हें सब दुःख हरि,
और नाम परिहरि नरहरि ठाये हौ।
बानर नहीं हो तुम मेरे बान रोष सम,
बलीमुख सूर बली मुख निजु गाये हौ।।
साखामृग नाहीं, बुद्धि बलन के साखामृग,
कैंधौं वेद साखामृग, केसव को भाये हौ।
साधु हनुमंत बलवंत यसवंत तुम,
गये एक काज कों अनेक करि आये हौ।।73।।

तोमर छंद

हनुमान- गइ मुद्रिका लै पार। मनि मोहि ल्याई वार।।
कह करîो मैं बल रंक। अतिमृतक जारी लंक।।74।।

राम पयान

तिथि विजय दसमी पाइ। उठि चले राम रघुराइ।।
हरि यूथ यूथप संग। बिन पच्छ के ते पतंग।।75।।

दंडक

सुग्रीव- कहै केसौदास, तुम सुनौ राजा रामचंद्र,
रावरी जबहि सैन उचकि चलति है।
पूरति है भूरि धूरि रोदसिंहिं (भूमि और आकाश) आसपास,
दिसि दिसि बरषा ज्यौं बलनि बलति है।।
पन्नग पतंग तरु गिरि गिरिराज गन,
गजराज मृगराज राजनि दलति है।
जहाँ तहाँ ऊपर पताल पय आइ जात,
पुरइनि के से पात पुहुमी हलति है।।76।।
लक्ष्मण- भार के उतारिबे को अवतरे रामचंद्र,
किधौं केसौदास भूरि भरन प्रबल दल।
टूटत हैं तरुवर गिरे गन गिरिवर,
सूखे सब सरवर सरिता सकल चल।।
उचकि चलत हरि दचकनि दचकत,
मंच ऐसे मचकत भूतल के थल थल।
लचकि लचकि जात सेस के असेस फन,
भागि गई भोगवती, (पातालपुरी) अतल, वितल, तल।।77।।
(दोहा) बल सागर लछिमन सहित, कपि सागर रनधीर।
यस-सागर रघुनाथ जू, मेले सागर तीर।।77।।

समुद्र वर्णन

विजय छंद

भूति विभूति पियूषहु की विष,
ईस सरीर कि पाप बियो है।
है किधौं केसव कस्यप को घर,
देव अदेवन के मन मोहै।।
संत हियौ कि बसै हरि संतत,
सोभ अनंत कहै, कवि को है।
चंदन नीर तरंग तरंगित,
नागर कोउ कि सागर सोहै।।79।।

गीतिका छंद

जलजाल काल कराल माल तिमिगिलादिक सों बसै।
उर लोभ छोभ विमोह कोह सकाम ज्यौं खल कों लसै।।
बहु संपदा युत जानिए अति पातकी सम लेखिए।
कोउ माँगनों (मंगन, भिक्षुक) अरु पाहुनो (मेहमान, अतिथि) नहिं नीर पीवत देखिए।।80।।