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हाय! हाय! रे आलू / विनय राय ‘बबुरंग’

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(जेवना साल आलू क पैदावार अधिका हो जाला तब किसानन क बड़ा फजीहत हो जाले। तब रउवा कविता पढ़ि के समझी आ बूझीं)

हाय! हाय रे आलू!
चटक गइल तालू
राखीं कहवा?
भक भक बसालू
हाय! हाय रे आलू!

टेक्टरन के लाम
सड़क भइल जाम
स्टोर घर भर गइल
सभकर नानी मर गइल
टेक्टर पर लाद लाद
भटकीलां कहां कहा
आखिर हम जाईं कहां
अक्किल मरा गइल
आंखि भइल आन्हर
डांड़ भइल जांगर
चढ़ावत-चढ़ावत
आजू क जोरा
रहि-रहि के याद आवे
हाथ में फोड़ा
आखिर ए आफत मेें
केतना हम दउरीं
केतना हम कहरीं
केतना हम पवरीं
जनि पूछीं हाल जइसे
भइल बानी चालू
हाय! हाय रे आलू।

एहर बिजुली खाद पानी क
दियाई कइसे बिल
अस ठोकाइल कील
मचल सगरो कोहराम
जै-जै सियाराम
जै-जै सियाराम
ना पइसा जुटी त
निकाली अब कुडुकी
जाइब हम जेल
कुल विकास फेल
छोड़ देइब कइल अब
विकास क खेती
जब अइसहीं बिकाई
कुल फसल सेंती
कहावत बा एगो
अंधेरी नगरी
चउपट राजा
टके सेर आलू
टके सेर भांजा
आहि हो दादा!
पगरी उतर गइल
जिनिगी अन्हार भइल
घट गइल केतना
किसानन क मोल
सेठन के चानी भइल
बेचिहें अनमोल
हमके बुझाला ना
ऊ केतना बा चालू
हाय! हाय! रे आलू!

हमार ई सुझाव बा
हर एक कोसन पर
जबले ना खुली
सरकारी स्टोर
हाथ पसार रोईं
खाली जेब टोईं
कबहू ना होई आंगन में भोर
केतना खपाई कुल नीजी स्टोर?
त काहें नाहीं सड़ी
आलू क बोड़ा
निकलन ना पँजी
अस लागल कोड़ा
जब पनिये क भाव में
बिकेला बोड़ा
केतनो पुकार करीं
सुनं ना तनिका ई
लात मारे अइसे
जइसे सनकेला घोड़ा
अंगने में धई के
भर पेट रोईं
आपन दीदा खोईं
बतावऽ ए काका
आहि हो दादा पूँजीपति चानी काटे
हम फांकी बालू
हाय! हाय! रे आलू
चटक गइल तालू
राखी एके कहवां
भक भक बसालू।