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अनुभाव-कथन / रस प्रबोध / रसलीन

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अनुभाव-कथन

कहि िविभाग को कहत हौं अब अनुभाव प्रकास।
जो हियते रतिभाव को प्रकट करे अनयास॥697॥
कटाच्छादि सों चारि बिधि अपने मन पहिचानि।
तिनिकों कबि यहि भाँति सों बरनत हैं जिय आनि॥698॥
कायक इक सो जानिये मानसु दूजो होइ।
आहारिज है तीसरो चौथी सातुकि जोइ॥699॥
कर की गति आदिक सोई कायक मानु विसेखि।
मन को मोद पराग किय सो मानस अविरेखि॥700॥
नृत्त समाज बनाव ते कृष्ण गोपिका ग्यान।
सो आहारिज जानिये बुध जन करत बखान॥701॥
बहुरो सातुक है सोइ स्वेदादिक ठहिरात।
इन भावन के भेद ये चारि जानि अविदात॥702॥
तन बिबिचारिन बिछति है यै सब सातुक भाव।
थाई परगट करन हित गने जात अनुभाव॥703॥
नारी औ नर करत है जो अनुभाव उदोत।
ते वै दूजो और कों नित उद्दीपन होत॥704॥

अनुभाव-उदाहरण

स्याम सैन तिय नैन तकि निकरि भीर तें आइ।
अधर आँगुरी धरि चली चित की चाह चिताइ॥705॥
मो मन भूल्यौ है कहूँ कोउ न देत बताइ।
मृगनैनी दृग लखि हँसति इनहिन परि ठहिराइ॥706॥
दृगन जोरि मुसुकाइ अरु भौंहें दुहुन नचाइ।
औठन आठ बनाइ यह प्रान उमेठति जाइ॥707॥
चितवत घायल करि हियो हायल कियो बनाइ।
फिरि हँसि मायल कै लली चली तरायल भाइ॥708॥